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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  1.8.60 
ताँहार अनन्त गुण के करु प्रकाश ।
ताँर प्रिय शिष्य इँह - पण्डित हरिदास ॥60॥
 
 
अनुवाद
अनंत आचार्य समस्त गुणों के भंडार थे। उनकी महानता का कोई अनुमान नहीं लगा सकता। पंडित हरिदास उनके प्रिय शिष्य थे।
 
Anant Acharya was the embodiment of all virtues. No one can estimate his greatness. Pandit Haridas was his favorite disciple.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, “श्री अनंत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के शाश्वत सहयोगियों में से एक हैं। इससे पहले, भगवान श्री कृष्ण के आगमन के समय, अनंत आचार्य सुदेवी थे, जो आठ गोपियों में से एक थीं। यह गौर-गणोद्देश-दीपिका (165) में इस प्रकार कहा गया है: अनंताचार्य-गोस्वामी या सु-देवी पुरा व्रजे। 'अनंत आचार्य गोस्वामी पहले व्रज [वृंदावन] में सुदेवी-गोपी थे।' जगन्नाथ पुरी, या पुरुषोत्तम-क्षेत्र में, गंगा-माता मठ नामक एक मठ है जिसकी स्थापना अनंत आचार्य ने की थी। गंगा-माता मठ के शिष्य उत्तराधिकार में उन्हें विनोद-मंजरी के रूप में जाना जाता है। उनके शिष्यों में से एक हरिदास पंडित गोस्वामी थे, जिन्हें श्री रघु गोपाल और श्री रास-मंजरी के नाम से भी जाना जाता है। उनकी शिष्या लक्ष्मीप्रिया, गंगा-माता की मौसी थीं, जो पुटिया के राजा की पुत्री थीं। गंगा-माता जयपुर के कृष्ण मिश्रा से श्री रसिक-राय के नाम की एक देवता लाईं और उन्हें जगन्नाथ पुरी में सर्वभौम के घर में स्थापित किया। श्री अनंत आचार्य के बाद पांचवीं पीढ़ी में शिष्य श्री वनमाली थे; छठी पीढ़ी में, श्री भगवान दास, जो एक बंगाली थे; सातवीं पीढ़ी में, मधुसूदन दास, जो एक उड़िया थे; आठवीं पीढ़ी में, नीलांबर दास; नौवीं पीढ़ी में, श्री नरसिंह दास; दसवीं पीढ़ी में, पीतांबर दास; और ग्यारहवीं पीढ़ी में, श्री माधव दास। बारहवीं पीढ़ी का शिष्य वर्तमान में गंगा-माता मठ का प्रभारी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)