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श्लोक 1.8.60  |
ताँहार अनन्त गुण के करु प्रकाश ।
ताँर प्रिय शिष्य इँह - पण्डित हरिदास ॥60॥ |
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| अनुवाद |
| अनंत आचार्य समस्त गुणों के भंडार थे। उनकी महानता का कोई अनुमान नहीं लगा सकता। पंडित हरिदास उनके प्रिय शिष्य थे। |
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| Anant Acharya was the embodiment of all virtues. No one can estimate his greatness. Pandit Haridas was his favorite disciple. |
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