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श्लोक 1.8.6  |
ए - सब ना माने येइ पण्डित सकल ।
ता - सबार विद्या - पाठ भेक - कोलाहल ॥6॥ |
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| अनुवाद |
| श्री चैतन्य चरितामृत के इन कथनों पर विश्वास न करने वाले तथाकथित विद्वान् विद्वानों द्वारा विकसित की गई शिक्षा, मेंढकों के शोरगुल वाले टर्राने के समान है। |
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| The pursuit of the teachings by such so-called scholars who do not believe in these statements of Sri Chaitanya Charitamrita is like the loud croaking of frogs. |
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