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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.8.5 
मूक कवित्व करे याँ - सबार स्मरणे ।
पङ्गु गिरि लङ्घ, अन्ध देखे तारा - गणे ॥5॥
 
 
अनुवाद
पंचतत्व के चरणकमलों का स्मरण करके गूंगा व्यक्ति कवि बन सकता है, लंगड़ा व्यक्ति पर्वतों को पार कर सकता है, तथा अंधा व्यक्ति आकाश में तारों को देख सकता है।
 
By remembering the lotus feet of the five elements, Ganga, a person can become a poet, a lame person can cross mountains and a blind person can see the stars in the sky.
तात्पर्य
वैष्णव दर्शन में पूर्णता के तीन मार्ग है-साधना-सिद्ध, अर्थात् नियमों और विनियमों के अनुसार भक्ति सेवा का पालन करने से प्राप्त पूर्णता, नित्य-सिद्ध, कृष्ण को कभी नहीं भूलने से प्राप्त शाश्वत पूर्णता, और कृपा-सिद्ध, आध्यात्मिक गुरु या किसी अन्य वैष्णव की कृपा से प्राप्त पूर्णता। कविराज गोस्वामी यहां कृपा-सिद्ध पर जोर देते हैं, श्रेष्ठ अधिकारियों की दया से पूर्णता। यह दया भक्त की योग्यताओं पर निर्भर नहीं करती है। ऐसी दया से, भले ही एक भक्त गूंगा है तो भी वह प्रभु को शानदार ढंग से गौरवान्वित करने के लिए बोल या लिख सकता है, भले ही वह लंगड़ा हो तो भी वह पहाड़ों को पार कर सकता है, और भले ही वह अंधा हो तो भी वह आकाश में तारे देख सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)