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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.8.41 
नारायणी - चैतन्येर उच्छि ष्ट - भाजन ।
ताँर ग र्भे जन्मिला श्री - दास - वृन्दावन ॥41॥
 
 
अनुवाद
नारायणी सदैव चैतन्य महाप्रभु के भोजन के अवशेष खाती हैं। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर उनके गर्भ से उत्पन्न हुए।
 
Narayani always ate the leftovers of Chaitanya Mahaprabhu. Srila Vrindavana Dasa Thakura was born from her womb.
तात्पर्य
गोर-गणोद्देश-दीपिका के 43वें श्लोक में, कवि-कर्णपूर द्वारा लिखित पुस्तक जो श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी साथियों का वर्णन करती है और वे पहले कौन थे, नारायणी के संबंध में निम्नलिखित कथन है:

अम्बिकायाः ससृजा यसीन नाम श्रीलकीलम्बिका

कृष्णोच्छिष्टं प्रभुंज्याना सेयं नारायणी मता

जब भगवान कृष्ण एक बच्चे थे, तब उनका पालन-पोषण अम्बिका नामक एक महिला द्वारा किया गया था, जिसकी एक छोटी बहन थी जिसका नाम कीलम्बिका था। भगवान चैतन्य के अवतार के समय, वही कीलम्बिका भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा छोड़े गए भोजन के अवशेष खाती थी। वह कीलम्बिका नारायणी थी, जो श्रीवास ठाकुर की भतीजी थी। बाद में, जब वह बड़ी हुई और विवाहित हुई, तो श्रील वृंदावन दास ठाकुर उससे पैदा हुए। भगवान श्री कृष्ण के भक्त को भगवान के प्रति समर्पित भक्ति सेवा के रूप में माना जाता है; इस प्रकार हम श्रील वृंदावन दास ठाकुर को नारायणी के पुत्र के रूप में जानते हैं। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने इस संबंध में टिप्पणी की है कि उसके पितृ वंश का कोई संदर्भ नहीं है क्योंकि इसे समझने की कोई आवश्यकता नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)