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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.8.4 
जय जय श्रीवासादि ग्रत भक्त - गण ।
प्रणत हुइया वन्दों सबार चरण ॥4॥
 
 
अनुवाद
मैं श्रीवास ठाकुर और भगवान के अन्य सभी भक्तों को सादर प्रणाम करता हूँ। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। मैं उनके चरणकमलों की वंदना करता हूँ।
 
I offer my respectful obeisances to Srivasa Thakura and all the other devotees of Mahaprabhu. I fall down before them and worship their lotus feet.
तात्पर्य
कृष्णदास कविराज गोस्वामी हमें पहले पंच-तत्व - श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु, अद्वैत प्रभु, गदाधर प्रभु और श्रीवास प्रभु और अन्य भक्तों को सम्मान देने की शिक्षा देते हैं। हमें पंच-तत्व को श्रद्धांजलि देने के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करना चाहिए, जैसा कि मंत्र श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु-नित्यानंद श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृंद में संक्षेपित किया गया है। प्रचार में प्रत्येक कार्यक्रम की शुरुआत में, विशेष रूप से हरे कृष्ण महा-मंत्र - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे - के जप से पहले, हमें पंच-तत्व के नामों का जप करना चाहिए और उन्हें भेट चढ़ानी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)