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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.8.39 
मनुष्ये रचिते नारे ऐछे ग्रन्थ धन्य ।
वृन्दावन - दास - मुखे वक्ता श्री - चैतन्य ॥39॥
 
 
अनुवाद
इस पुस्तक का विषय इतना उदात्त है कि ऐसा प्रतीत होता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से श्री वृन्दावन दास ठाकुर के लेखन के माध्यम से बात की है।
 
The subject matter of this book is so grand that it seems as if Sri Chaitanya Mahaprabhu himself is speaking through the composition of Sri Vrindavan Das Thakur.
तात्पर्य
श्रील सनातन गोस्वामी ने अपने हरिभक्ति-विलास में लिखा है:

अवैष्णव-मुखोद्गीर्णम् पुर्त हरि-कथामृतम्

श्रवणं नैव कर्त्तव्यम् सर्पोच्छिष्टं यथा पयः।

"किसी गैर-वैष्णव से कृष्ण के बारे में कुछ नहीं सुनना चाहिए। साँप द्वारा छुआ दूध विषाक्त हो जाता है; उसी तरह, किसी गैर-वैष्णव द्वारा बतायी कृष्ण की कथाएँ भी विषाक्त होती हैं।"

पवित्र वैदिक सिद्धांतों, पुराणों और पंचरात्रिक-विधि के निष्कर्षों का कड़ाई से पालन करने वाला लोकोत्तर साहित्य केवल एक शुद्ध भक्त ही लिख सकता है। किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भक्ति पर किताबें लिखना संभव नहीं है, क्योंकि उसके लेखन प्रभावी नहीं होंगे। वह एक बहुत बड़ा विद्वान हो सकता है और भव्य भाषा में साहित्य प्रस्तुत करने में विशेषज्ञ हो सकता है, लेकिन यह लोकोत्तर साहित्य को समझने में बिल्कुल भी मददगार नहीं है। भले ही लोकोत्तर साहित्य त्रुटिपूर्ण भाषा में लिखा गया हो, यदि वह किसी भक्त द्वारा लिखा गया हो तो स्वीकार्य है, जबकि सांसारिक विद्वान द्वारा लिखा गया तथाकथित लोकोत्तर साहित्य, भले ही वह बहुत ही उच्च साहित्यिक प्रस्तुति हो, स्वीकार नहीं किया जा सकता। किसी भक्त के लेखन में रहस्य यह है कि जब वह भगवान के लीलाओं के बारे में लिखता है, तो भगवान उसकी मदद करते हैं; वह अकेले नहीं लिखता। जैसा कि भगवद गीता (10.10) में कहा गया है, ददामि बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते। चूंकि एक भक्त भगवान की सेवा में लिखता है, भगवान उसे भीतर से इतनी बुद्धि देते हैं कि वह भगवान के पास बैठकर किताबें लिखता रहता है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी इस बात की पुष्टि करते हैं कि वृंदावन दास ठाकुर ने जो लिखा था वह वास्तव में भगवान चैतन्य महाप्रभु ने ही बोला था, और उन्होंने उसे केवल दोहराया। यही बात श्री चैतन्य-चरितामृत के लिए भी सच है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने अपने बुढ़ापे में, एक अशक्त स्थिति में, श्री चैतन्य-चरितामृत लिखा था, लेकिन यह ऐसा उत्कृष्ट साहित्य है कि श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज कहते थे, "वह समय आएगा जब दुनिया के लोग श्री चैतन्य-चरितामृत को पढ़ने के लिए बांग्ला सीखेंगे।" हम श्री चैतन्य-चरितामृत को अंग्रेजी में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं और नहीं जानते कि यह कितना सफल होगा, लेकिन अगर कोई बांग्ला में मूल चैतन्य-चरितामृत पढ़ता है तो उसे भक्ति सेवा में बढ़ती हुई परमानंद का आनंद मिलेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)