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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.8.33 
ओरे मूढ़ लोक, शुन चैतन्य - मङ्गल ।
चैतन्य - महिमा य़ाते जानिबे सकल ॥33॥
 
 
अनुवाद
अरे मूर्खो, श्री चैतन्य-मंगल पढ़ो! इस पुस्तक को पढ़कर तुम श्री चैतन्य महाप्रभु की समस्त महिमा को समझ सकते हो।
 
You fool, read Sri Chaitanya Mangala! By reading this book, you will understand all the glories of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
श्री वृंदावन दास ठाकुर का श्री चैतन्य-भागवत मूलतः श्री चैतन्य-मंगल नाम से प्रसिद्ध था, परन्तु जब श्रील लोचन दास ठाकुर ने बाद में श्री चैतन्य-मंगल नाम से एक अन्य पुस्तक लिखी, तो श्रील वृंदावन दास ठाकुर ने अपनी पुस्तक का नाम बदल दिया, जो अब श्री चैतन्य-भागवत के रूप में जानी जाती है। श्री चैतन्य-भागवत में श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन का विस्तृत वर्णन है, और कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने हमें पहले ही सूचित किया है कि उनके श्री चैतन्य-चरितामृत में उन्होंने वह सब वर्णन किया है जिसका उल्लेख वृंदावन दास ठाकुर ने नहीं किया है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा श्री चैतन्य-भागवत की यह स्वीकृति, शिष्य-परंपरा की उनकी स्वीकृति को इंगित करती है। आध्यात्मिक साहित्य का एक लेखक कभी भी पिछले आचार्यों को पार करने का प्रयास नहीं करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)