हरि कृष्ण महामंत्र का जाप करते समय दस अपराधों से बचना चाहिए। पहला अपराध भगवान के पवित्र नाम के वितरण में लगे महान व्यक्तियों की निंदा करना है। शास्त्र (सीसी-अंत्य 7.11) में कहा गया है कि कृष्ण-शक्ति बिना नाहे तारा प्रवर्तन: भगवान श्री कृष्ण की सर्वोच्च व्यक्तिगत शक्ति द्वारा अधिकृत किए बिना कोई भी हरि कृष्ण महामंत्र के पवित्र नामों का वितरण नहीं कर सकता है। इसलिए किसी ऐसे भक्त की आलोचना या निंदा नहीं करनी चाहिए जो इस प्रकार लगा हुआ है।
श्री पद्म पुराण में कहा गया है:
सतां निंदा नाम्न: परमं अपराधं वितानते
यतः ख्याति यम तम कथम सहते तद्-विगर्हम्
हरि कृष्ण महामंत्र की महिमा का प्रचार करने वाले महान संत व्यक्तियों की निंदा करना पवित्र नाम के चरण कमलों में सबसे बड़ा अपराध है। हरि कृष्ण महामंत्र के महिमा के प्रचारक की आलोचना नहीं करनी चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह अपराधी है। नाम-प्रभु, जो कृष्ण के समान हैं, ऐसी निंदनीय गतिविधियों को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे, भले ही वह एक महान भक्त के रूप में प्रसिद्ध हो।
दूसरे नामपराध का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
शिवस्य श्री-विष्णोर्य इह गुण-नामदि-सकळम
धीया भिन्नम पश्येत स खलु हरि-नामाहित-कर:
इस भौतिक संसार में, विष्णु का पवित्र नाम सर्व-मंगलमय है। विष्णु का नाम, रूप, गुण और लीलाएं सभी पारलौकिक, परम ज्ञान है। इसलिए, यदि कोई ईश्वर को उनके पवित्र नाम या उनके पारलौकिक रूप, गुणों और लीलाओं से अलग करने की कोशिश करता है, तो उन्हें भौतिक मानकर, यह अपमानजनक है। इसी तरह, यह सोचना कि भगवान शिव जैसे देवता के नाम भगवान विष्णु के नाम के समान अच्छे हैं - या, दूसरे शब्दों में, यह सोचना कि भगवान शिव और अन्य देवता ईश्वर के अन्य रूप हैं और इसलिए विष्णु के समान हैं - भी ईश निंदा है। भगवान के पवित्र नाम के चरण कमलों में यह दूसरा अपराध है।
पवित्र नाम के चरण कमलों पर तीसरा अपराध, जिसे गुरोर अवज्ञा कहा जाता है, आध्यात्मिक गुरु को भौतिक मानना है और इसलिए उनकी श्रेष्ठ स्थिति से ईर्ष्या करना है। चौथा अपराध (श्रुति-शास्त्र-निंदनम) चार वेदों और पुराणों जैसे वैदिक साहित्यों की निंदा करना है। पाँचवाँ अपराध (अर्थवाद) पवित्र नाम की महिमा को अतिशयोक्ति मानना है। इसी तरह, छठा अपराध (हरि-नामनी कल्पनाम) भगवान के पवित्र नाम को काल्पनिक मानना है।
सातवें अपराध का वर्णन इस प्रकार है:
नाम्नो बलद यस्य हि पाप-बुद्धि:
ना विद्यते तस्य यमैर हि शुद्धि:
यह सोचना कि चूंकि हरि कृष्ण मंत्र सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार कर सकता है, इसलिए व्यक्ति अपनी पापपूर्ण गतिविधियों से दूर हो सकता है और साथ ही उन्हें बेअसर करने के लिए हरि कृष्ण मंत्र का जाप कर सकता है, हरि-नाम के चरण कमलों में सबसे बड़ा अपराध है।
आठवां अपराध इस प्रकार कहा गया है:
धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्व-
शुभ-क्रिया-साम्यम अपि प्रमाद:
हरि कृष्ण मंत्र के जाप को एक धार्मिक अनुष्ठान समारोह मानना अपमानजनक है। धार्मिक अनुष्ठान करना, व्रतों का पालन करना और त्याग और बलिदान का अभ्यास करना सभी भौतिकवादी शुभ कार्य हैं। हरि कृष्ण महामंत्र का जाप की तुलना ऐसी भौतिकवादी धार्मिकता से नहीं की जानी चाहिए। यह प्रभु के पवित्र नाम के चरण कमलों में अपराध है।
नौवें अपराध का वर्णन इस प्रकार है:
अश्रद्धाधने विमुखे 'प्य अश्रुणवति
यशोपदेश: शिव-नामापराधः
यह अपराध है पवित्र नाम की महिमा उन व्यक्तियों के बीच प्रचार करना जिनके पास बुद्धि नहीं है या विषय वस्तु में कोई श्रद्धा नहीं है। ऐसे लोगों को हरि कृष्ण मंत्र को जप कर सुनने का मौका दिया जाना चाहिए, लेकिन शुरुआत में उन्हें पवित्र नाम की महिमा या आध्यात्मिक महत्व के बारे में निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए। पवित्र नाम को लगातार सुनने से उनके दिल शुद्ध हो जाएंगे, और फिर वे पवित्र नाम की पारलौकिक स्थिति को समझ पाएंगे।
दसवां अपराध इस प्रकार है:
श्रूते 'पि नाम-माहात्म्ये यः प्रीति-रहितो नरः
अहम-ममादि-परमो नाम्नि सो 'प्य अपराध-कृत्
यदि किसी ने भगवान के पारलौकिक पवित्र नाम की महिमा सुनी है, लेकिन फिर भी जीवन की भौतिकवादी अवधारणा में जारी है, यह सोचकर कि "मैं यह शरीर हूं और इस शरीर से संबंधित सब कुछ मेरा है [अहं ममेति]," और इसके लिए सम्मान और प्रेम नहीं दिखाता है। हरि कृष्ण महा-मंत्र का जप, यह एक अपराध है।
