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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.8.22 
अद्यापिह देख चैतन्य - नाम येइ लय ।
कृष्ण - प्रेमे पुलकाश्रु - विह्वल से हय ॥22॥
 
 
अनुवाद
चाहे वह आपत्तिजनक हो या अआपत्तिजनक, जो कोई भी अब भी श्रीकृष्ण-चैतन्य प्रभु-नित्यानन्द का जप करता है, वह तुरन्त परमानंद से अभिभूत हो जाता है, और उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं।
 
Whether one is guilty or innocent, if one still chants “Sri Krishna Chaitanya Prabhu Nityananda”, one becomes emotional and tears come to his eyes.
तात्पर्य
प्राकृत-सहाजिया जो नितई-गौर राधे श्यामा का जाप करते हैं उन्हें भगवत निष्कर्ष का बहुत ही कम ज्ञान है, और वे वैष्णव नियमों और विनियमों का पालन शायद ही करते हैं, और फिर भी क्योंकि वे भज नितई-गौर का जाप करते हैं, उनका जाप तुरंत आंसू और परमानंद के अन्य संकेतों को उभारता है। यद्यपि वे वैष्णव दर्शन के सिद्धांतों को नहीं जानते हैं और शिक्षा में बहुत अधिक उन्नत नहीं हैं, इन लक्षणों से वे कई पुरुषों को अपने अनुयायी बनने के लिए आकर्षित करते हैं। उनके परमानंदित आंसू निश्चित रूप से लंबे समय में उनकी मदद करेंगे, क्योंकि जैसे ही वे एक शुद्ध भक्त के संपर्क में आएंगे उनका जीवन सफल हो जाएगा। हालाँकि शुरुआत में भी, क्योंकि वे नितई-गौर के पवित्र नामों का जाप कर रहे हैं, ईश्वर के प्रति प्रेम के मार्ग पर उनकी तीव्र उन्नति बहुत प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)