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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.8.21 
स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम - निगूढ़ - भाण्डार ।
बिलाइल यारे तारे, ना कैल विचार ॥21॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वयं भगवान् होने के नाते, पूर्णतः स्वतंत्र हैं। अतः, यद्यपि यह अत्यंत गोपनीय वरदान है, फिर भी वे बिना किसी विचार के, सभी को भगवान् का प्रेम बाँट सकते हैं।
 
As the Supreme Personality of Godhead, Sri Chaitanya Mahaprabhu is completely independent. Therefore, He can distribute the most secretly accumulated boon of love for the Lord to everyone without any discrimination.
तात्पर्य
यह भगवान चैतन्य के आंदोलन का लाभ है। यदि कोई किसी न किसी तरह हरे कृष्ण आंदोलन के संपर्क में आता है, बिना यह विचार किए कि वह एक शूद्र है, वैश्य है, जगई है, माधाई है या इससे भी नीचा है, वह आध्यात्मिक चेतना में उन्नति करता है और तुरंत भगवान के प्रति प्रेम विकसित करता है। अब हमारे पास वास्तविक अनुभव है कि पूरी दुनिया में यह आंदोलन हरे कृष्ण महा-मंत्र के उच्चारण से कई ऐसे लोगों को भगवान का प्रेमी बना रहा है। वास्तव में, श्री चैतन्य महाप्रभु पूरे विश्व के आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रकट हुए हैं। वह अपराधियों और निर्दोषों के बीच भेद नहीं करते हैं। कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते: वह उदारतापूर्वक सभी को भगवान का प्रेम प्रदान करते हैं। इसका वास्तव में अनुभव किया जा सकता है, जैसा कि अगली कविता में बताया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)