Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.8.20 
हेन प्रेम श्री - चैतन्य दिला यथा तथा ।
जगाइ माधाइ पर्यन्त - अन्येर का कथा ॥20॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण का यह प्रेम सर्वत्र और सर्वत्र, यहाँ तक कि जगाई और माधाई जैसे अत्यंत पतित लोगों को भी, मुक्त भाव से प्रदान किया है। तो फिर उन लोगों की तो बात ही क्या जो पहले से ही पवित्र और श्रेष्ठ हैं?
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu has generously bestowed this love of Krishna everywhere, even to the most fallen of the low, like Jagai and Madhai. So what can be said about those who are already pure and elevated?
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने मानव समाज को जो दिया और अन्य लोगों ने मानव समाज को जो दिया, इन दोनों में अंतर यह है कि जहां तथाकथित मानवतावादी और परोपकारी कार्यकर्ताओं ने मानव समाज को सिर्फ शरीर को लेकर कुछ राहत दी है, वहीं श्री चैतन्य महाप्रभु ईश्वर के प्रति प्रेम के साथ घर लौटने, भगवदलोक लौटने के सर्वोत्तम साधन देते हैं। अगर कोई इन दोनों उपहारों का गंभीरता से तुलनात्मक अध्ययन करे, तो निश्चित रूप से अगर वह थोड़ा भी समझदार है तो श्रेय श्री चैतन्य महाप्रभु को ही देगा। इसी उद्देश्य से कविराज गोस्वामी ने कहा:

श्री-कृष्ण-चैतन्य-दया करह विचार

विचार करिले चित्ते पाबे चमत्कार

"यदि वास्तव में आप तर्क और युक्ति में रुचि रखते हैं, तो कृपा करके श्री चैतन्य महाप्रभु की दया को उसमें लागू करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप पाएंगे कि यह आश्चर्यजनक रूप से अद्भुत है।" (चै. च. आ. 8.15)

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:

दीन-हीन यत चिला, हरि-नामे उद्धारिला,

तार साक्षी जगई माधाई

कलियुग के अधर्मी लोगों के समूह के उदाहरण जगई और माधई नामक दो भाई हैं। वे समाज में अत्यंत अशांत करने वाले तत्व थे क्योंकि वे मांसाहारी, शराबी, व्यभिचारी, धूर्त और चोर थे। फिर भी श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें उद्धार किया, और उन लोगों की तो बात ही छोड़िए जो समझदार, धार्मिक, भक्त और कर्तव्यनिष्ठ थे। भगवद्गीता इस बात की पुष्टि करती है कि ब्राह्मण-योग्य भक्तों और राजर्षियों (किं पुनः ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा) की बात तो छोड़ ही दीजिए, शुद्ध भक्त की संगति से जो भी कृष्ण भावना को प्राप्त करता है, वह भगवदलोक, घर लौटने के योग्य हो जाता है। भगवद्गीता (9.32) में भगवान इस प्रकार घोषणा करते हैं:

मां हि पार्थ व्यापाश्रित्य येऽपि स्युः पाप-योनिषु

स्त्रीयो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम्

"हे पृथा के पुत्र, जो मेरी शरण में आते हैं, भले ही वे निचले जन्मों के हों - स्त्रियाँ, वैश्य [व्यापारी] और शूद्र [श्रमिक] - वे भी परम धाम को प्राप्त कर सकते हैं।"

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दो पतित भाइयों जगई और माधई को उद्धार किया, परंतु वर्तमान में सारा संसार जगई और माधई से भरा हुआ है, या दूसरे शब्दों में, व्यभिचारियों, मांसाहारियों, जुआरियों, चोरों और अन्य धूर्तों से जो समाज में सभी प्रकार की अशांतियां पैदा करते हैं। ऐसे व्यक्तियों की गतिविधियाँ अब सामान्य प्रथा बन गई हैं। अब शराबी, व्यभिचारी, मांसाहारी, चोर या धूर्त होना घृणित नहीं माना जाता, क्योंकि इन तत्वों को मानव समाज में आत्मसात कर लिया गया है। हालाँकि, इसका यह मतलब नहीं है कि ऐसे व्यक्तियों के घृणित गुण मानव समाज को माया के चंगुल से मुक्त करने में मदद करेंगे। बल्कि, वे मानवता को भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों की प्रतिक्रियाओं में और अधिक उलझाएंगे। किसी की भी सभी गतिविधियाँ भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव में होती हैं (प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः)। क्योंकि लोग अब अज्ञान के गुण (तमो-गुण) और कुछ हद तक काम (रजो-गुण) से जुड़ रहे हैं, सत्व-गुण (सात्त्विक गुण) का कोई नामोनिशान नहीं है, वे अधिक से अधिक लालची और कामुक होते जा रहे हैं, क्योंकि यही इन गुणों से जुड़ने का असर होता है। तदा रजस-तमो-भावाः काम-लोभा दयश्च ये: "भौतिक प्रकृति के दो निचले गुणों के साथ जुड़ने से व्यक्ति कामुक और लालची हो जाता है।" (भा. 1.2.19) दरअसल, आधुनिक मानव समाज में, हर कोई लालची और कामुक है, और इसलिए उद्धार का एकमात्र साधन श्री चैतन्य महाप्रभु का संकीर्तन आंदोलन है, जो सभी जगई और माधई को सात्त्विक गुण, या ब्राह्मण संस्कृति की सर्वोच्च स्थिति तक पहुँचा सकता है।

श्रीमद्भागवतम (1.2.18-19) में कहा गया है:

नष्ट-प्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवत-सेवया

भगवत्य् उत्तम-श्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी

तदा रजस-तमो-भावाः काम-लोभा दयश्च ये

चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति

श्री चैतन्य महाप्रभु के मानव समाज को दिए उपहार और अन्य लोगों के उपहार के बीच अंतर यह है कि जहां कथित परोपकारी और मानवतावादी कार्यकर्ताओं ने मानव समाज को शारीरिक तौर पर कुछ राहत प्रदान की है, वहीं श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम के साथ ईश्वर के पास घर वापस लौटने और भगवान के पास लौटने के सर्वोत्तम अवसर प्रदान करते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन दोनों उपहारों का गंभीरता से तुलनात्मक अध्ययन करता है, तो निश्चय ही उसे श्री चैतन्य महाप्रभु को श्रेष्ठ मानना होगा। इसी अभिप्राय से कविराज गोस्वामी ने कहा:

श्री कृष्ण चैतन्य दया करहु विचार

विचार करिले चित्ते पाबे चमत्कार

“यदि आप वास्तव में तर्क और युक्ति में रुचि रखते हैं, तो दया करके श्री चैतन्य महाप्रभु की दया पर लागू करें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप इसे आश्चर्यजनक रूप से चमत्कारी पाएँगे।“ (चै. च. आ. 8.15)

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:

दीन हीन यत चिला हरि नामे उद्धारिला

तार साक्षी जगई माधाई

कलि के पापी लोगों के समूह के उदाहरण जगई और माधई नामक दो भाई हैं। वे समाज में सबसे अधिक अशांत करने वाले तत्व थे, क्योंकि वे मांसाहारी, शराबी, व्यभिचारी, धूर्त और चोर थे। फिर भी श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें मोक्ष दिलाया, तो उन लोगों के विषय में कहना ही क्या जो समझदार, धार्मिक, भक्त और कर्तव्यनिष्ठ थे। भगवद्गीता इस बात की पुष्टि करती है कि ब्राह्मण योग्य भक्तों और राजर्षि (किन पुन: ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा) को तो छोड़िए, जो शुद्ध भक्त के संग से कृष्ण भावना को प्राप्त करता है, वह घर और भगवान के पास लौटने का अधिकारी बन जाता है। भगवद्गीता (9.32) में भगवान इस प्रकार घोषणा करते हैं:

माँ हि पार्थ व्यापाश्रित्य येऽपि स्युः पाप योनिषु

स्त्रीयो वैश्यास्तथा शूद्रा स्तेऽपि यांति परां गतिम्

“हे प्रथा के पुत्र! जो लोग मेरी शरण में आते हैं, भले ही वे निम्न योनि में जन्मे हों-स्त्रियाँ, वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (कर्मकांडी)-वे भी परम धाम को प्राप्त कर सकते हैं।”

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दो पतित भाइयों

मानव समाज की अव्यवस्थित स्थिति को देखते हुए, यदि कोई वास्तव में शांति और निश्चिंतता चाहता है, तो उसे कृष्ण चेतना आंदोलन अपनाना चाहिए और हमेशा भागवत-धर्म में व्यस्त रहना चाहिए। भागवत-धर्म में व्यस्तता सभी अज्ञानता और जुनून को दूर कर देती है, और जब अज्ञानता और जुनून दूर हो जाते हैं तो व्यक्ति लोभ और वासना से मुक्त हो जाता है। जब लोभ और वासना से मुक्त हो जाता है, तो व्यक्ति ब्राह्मण रूप से योग्य हो जाता है, और जब ब्राह्मण रूप से योग्य व्यक्ति और आगे बढ़ता है, तो वह वैष्णव प्लेटफॉर्म पर स्थित हो जाता है। यह केवल इस वैष्णव प्लेटफ़ॉर्म पर ही संभव है कि ईश्वर के प्रति अपने निष्क्रिय प्रेम को जगाया जा सके, और जैसे ही कोई ऐसा करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है।

वर्तमान में, मानव समाज विशेष रूप से अज्ञानता के तरीके (तम-गुणा) की खेती कर रहा है, हालाँकि जुनून के कुछ लक्षण भी हो सकते हैं (राजो-गुणा)। काम और लोभ, वासना और लालच से भरी हुई, दुनिया की पूरी आबादी में ज्यादातर शूद्र और कुछ वैश्य होते हैं, और धीरे-धीरे यह हो रहा है कि केवल शूद्र ही हैं। साम्यवाद शूद्रों का एक आंदोलन है, और पूंजीवाद वैश्यों के लिए है। इन दो गुटों, शूद्रों और वैश्यों के बीच लड़ाई में, धीरे-धीरे, समाज की घृणित स्थिति के कारण, कम्युनिस्ट विजयी उभरेंगे, और जैसे ही यह होगा, जो कुछ भी समाज बचा है वह बर्बाद हो जाएगा। साम्यवाद की प्रवृत्ति का प्रतिकार करने वाला एकमात्र संभव उपाय कृष्ण चेतना आंदोलन है, जो साम्यवादियों को भी साम्यवादी समाज का वास्तविक विचार दे सकता है। साम्यवाद के सिद्धांत के अनुसार, राज्य को हर चीज का मालिक होना चाहिए। लेकिन कृष्ण चेतना आंदोलन, इसी विचार का विस्तार करते हुए, ईश्वर को हर चीज का स्वामी मानता है। लोग इसे समझ नहीं पाते क्योंकि उन्हें ईश्वर की कोई समझ नहीं है, लेकिन कृष्ण चेतना आंदोलन उन्हें ईश्वर को समझने और यह समझने में मदद कर सकता है कि सब कुछ ईश्वर का है। चूँकि सब कुछ ईश्वर की संपत्ति है, और सभी जीवित संस्थाएँ — न केवल मनुष्य बल्कि जानवर, पक्षी, पौधे आदि भी — ईश्वर की संतानें हैं, इसलिए हर किसी को ईश्वर की चेतना के साथ ईश्वर की कीमत पर जीने का अधिकार है। यही कृष्ण चेतना आंदोलन का सार है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)