Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.8.19 
राजन्पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां दैवं प्रियः कुल - पतिः क्व च किङ्करो वः ।
अस्त्वेवमङ्ग भगवान्भजतां मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्ति - योगम् ॥19॥
 
 
अनुवाद
[महान ऋषि शुकदेव ने कहा:] "हे महाराज परीक्षित, भगवान कृष्ण सदैव आपकी सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। वे आपके स्वामी, गुरु, ईश्वर, परम प्रिय मित्र और आपके परिवार के मुखिया भी हैं। फिर भी, कभी-कभी वे आपके सेवक या आज्ञापालक बनने के लिए सहमत हो जाते हैं। आप परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि यह सम्बन्ध केवल भक्तियोग से ही संभव है। भगवान मुक्ति तो बहुत सरलता से प्रदान कर सकते हैं, परन्तु भक्तियोग सरलता से प्रदान नहीं करते, क्योंकि इसी प्रक्रिया द्वारा वे भक्त से बंध जाते हैं।"
 
[Maharishi Narada said] “O Maharaja Yudhishthira, the Supreme Personality of Godhead, Lord Krishna, is always ready to help you. He is your master, guru, God, dear friend, and head of your family. Yet, He sometimes accepts to act as your slave or obedient servant. You are extremely fortunate, for this relationship is possible only through devotional service. The Lord can easily grant liberation, but He does not easily grant devotional service to anyone, for through that process He becomes bound to the devotee.”
तात्पर्य
यह पद श्रीमद्-भागवतम् (5.6.18) से उद्धृत है। जबकि शुकदेव गोस्वामी ऋषभदेव के चरित्र का वर्णन कर रहे थे, उन्होंने इस पद का पाठ करके भक्ति-योग और मुक्ति के बीच अंतर किया। यादवों और पाण्डवों के साथ संबंध में, भगवान ने कभी उनके स्वामी के रूप में, कभी उनके सलाहकार के रूप में, कभी उनके मित्र के रूप में, कभी उनके परिवार के मुखिया के रूप में और कभी उनके सेवक के रूप में कार्य किया। एक बार कृष्ण को शांति वार्ता के संबंध में दुर्योधन को लिखे युधिष्ठिर के पत्र को ले जा कर उनके आदेश को पूरा करना पड़ा था। इसी प्रकार, वह अर्जुन के सारथी भी बने। यह दर्शाता है कि भक्ति-योग में परमेश्वर भगवान और भक्त के बीच एक संबंध स्थापित होता है। ऐसा संबंध दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य जैसी अलौकिक कोमल भावनाओं में स्थापित होता है। अगर कोई भक्त केवल मुक्ति चाहता है, तो वह परमेश्वर भगवान से इसे बहुत आसानी से प्राप्त कर लेता है, जैसा कि बिल्वमंगल ठाकुर ने पुष्टि की है। मुक्तिः स्वयं मुकुलितांजलि सेवतेऽस्मान: एक भक्त के लिए मुक्ति बहुत महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि मुक्ति हमेशा उसकी चौखट पर खड़ी रहती है और उसकी किसी तरह से सेवा करने के लिए इंतज़ार करती है। इसलिए, एक भक्त को वृंदावन के निवासियों के व्यवहार से आकर्षित होना चाहिए, जो कृष्ण के साथ संबंध में रहते हैं। भूमि, जल, गायें, पेड़ और फूल कृष्ण की शांत-रस भावना में सेवा करते हैं, उनके सेवक उनकी दास्य-रस भावना में सेवा करते हैं और उनके ग्वाले मित्र उनकी सख्य-रस भावना में सेवा करते हैं। इसी तरह, बड़े गोपियाँ और गोप कृष्ण की सेवा अपने पिता और माता, चाचा और अन्य रिश्तेदारों के रूप में करते हैं और छोटी गोपियाँ, ग्वालिन बालिकाएँ कृष्ण की सेवा वैवाहिक प्रेम में करती हैं।

भक्तिमय सेवा करते समय, किसी व्यक्ति को इनमें से किसी एक अलौकिक संबंध में कृष्ण की सेवा करने के लिए स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यही जीवन की वास्तविक सफलता है। एक भक्त के लिए मुक्ति प्राप्त करना बहुत मुश्किल नहीं है। यहाँ तक कि जो कोई कृष्ण के साथ संबंध स्थापित करने में असमर्थ है, वह ब्रह्म तेज में विलीन होकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इसे सयुज्य-मुक्ति कहते हैं। वैष्णव कभी भी सयुज्य-मुक्ति को स्वीकार नहीं करते, हालाँकि कभी-कभी वे मुक्ति के अन्य रूपों को स्वीकार करते हैं, जैसे कि सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य और साष्टी। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त किसी भी प्रकार की मुक्ति को स्वीकार नहीं करता है। वह केवल कृष्ण को एक अलौकिक संबंध में सेवा करना चाहता है। यह आध्यात्मिक जीवन की पूर्णावस्था है। मायावादी दार्शनिक ब्रह्म तेज के अस्तित्व में विलीन होना चाहते हैं, हालाँकि मुक्ति के इस पहलू की भक्तों द्वारा हमेशा उपेक्षा की जाती है। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर ने इस प्रकार की मुक्ति का वर्णन करते हुए, जिसे कैवल्य कहा जाता है या परम के साथ एक होना कहा जाता है, कहा है, कैवल्यं नरकायते: "परम के साथ एक होना नरक में जाने के समान है।" इसलिए मायावाद दर्शन का आदर्श, परम के साथ एक होना, एक भक्त के लिए नारकीय है; वह इसे कभी स्वीकार नहीं करता। मायावादी दार्शनिक नहीं जानते कि अगर वे परम के तेज में विलीन भी हो जाते हैं, तो भी यह उन्हें अंतिम विश्राम नहीं देगा। एक व्यक्तिगत आत्मा निष्क्रियता की स्थिति में ब्रह्म तेज में नहीं रह सकती है; कुछ समय बाद, उसे सक्रिय होने की इच्छा करनी चाहिए। हालाँकि, चूँकि वह भगवान के साथ अपने संबंध से अवगत नहीं है और इसलिए उसकी कोई आध्यात्मिक गतिविधि नहीं है, इसलिए उसे इस भौतिक संसार में आगे की गतिविधियों के लिए नीचे आना चाहिए। इसकी पुष्टि श्रीमद्-भागवतम् (10.2.32) में की गई है:

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः

 पतंति अधोऽनादृत-युष्मद-अंघ्रयः

क्योंकि मायावादी दार्शनिकों को भगवान की अलौकिक सेवा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, भौतिक गतिविधियों से मुक्ति प्राप्त करने और ब्रह्म तेज में विलीन होने के बाद भी, उन्हें अस्पताल या स्कूल खोलने या इसी तरह की परोपकारी गतिविधियों को करने के लिए फिर से इस भौतिक संसार में आना होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)