भक्तिमय सेवा करते समय, किसी व्यक्ति को इनमें से किसी एक अलौकिक संबंध में कृष्ण की सेवा करने के लिए स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यही जीवन की वास्तविक सफलता है। एक भक्त के लिए मुक्ति प्राप्त करना बहुत मुश्किल नहीं है। यहाँ तक कि जो कोई कृष्ण के साथ संबंध स्थापित करने में असमर्थ है, वह ब्रह्म तेज में विलीन होकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इसे सयुज्य-मुक्ति कहते हैं। वैष्णव कभी भी सयुज्य-मुक्ति को स्वीकार नहीं करते, हालाँकि कभी-कभी वे मुक्ति के अन्य रूपों को स्वीकार करते हैं, जैसे कि सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य और साष्टी। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त किसी भी प्रकार की मुक्ति को स्वीकार नहीं करता है। वह केवल कृष्ण को एक अलौकिक संबंध में सेवा करना चाहता है। यह आध्यात्मिक जीवन की पूर्णावस्था है। मायावादी दार्शनिक ब्रह्म तेज के अस्तित्व में विलीन होना चाहते हैं, हालाँकि मुक्ति के इस पहलू की भक्तों द्वारा हमेशा उपेक्षा की जाती है। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर ने इस प्रकार की मुक्ति का वर्णन करते हुए, जिसे कैवल्य कहा जाता है या परम के साथ एक होना कहा जाता है, कहा है, कैवल्यं नरकायते: "परम के साथ एक होना नरक में जाने के समान है।" इसलिए मायावाद दर्शन का आदर्श, परम के साथ एक होना, एक भक्त के लिए नारकीय है; वह इसे कभी स्वीकार नहीं करता। मायावादी दार्शनिक नहीं जानते कि अगर वे परम के तेज में विलीन भी हो जाते हैं, तो भी यह उन्हें अंतिम विश्राम नहीं देगा। एक व्यक्तिगत आत्मा निष्क्रियता की स्थिति में ब्रह्म तेज में नहीं रह सकती है; कुछ समय बाद, उसे सक्रिय होने की इच्छा करनी चाहिए। हालाँकि, चूँकि वह भगवान के साथ अपने संबंध से अवगत नहीं है और इसलिए उसकी कोई आध्यात्मिक गतिविधि नहीं है, इसलिए उसे इस भौतिक संसार में आगे की गतिविधियों के लिए नीचे आना चाहिए। इसकी पुष्टि श्रीमद्-भागवतम् (10.2.32) में की गई है:
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतंति अधोऽनादृत-युष्मद-अंघ्रयः
क्योंकि मायावादी दार्शनिकों को भगवान की अलौकिक सेवा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, भौतिक गतिविधियों से मुक्ति प्राप्त करने और ब्रह्म तेज में विलीन होने के बाद भी, उन्हें अस्पताल या स्कूल खोलने या इसी तरह की परोपकारी गतिविधियों को करने के लिए फिर से इस भौतिक संसार में आना होगा।
