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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.8.13 
अतएव पुनः कहों ऊर्ध्व - बाहु हञा ।
चैतन्य - नित्यानन्द भज कुतर्क छाड़िया ॥13॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं पुनः कहता हूँ, अपनी भुजाएँ उठाकर: हे मानवो, कृपया झूठे तर्कों के बिना श्री चैतन्य और नित्यानंद की पूजा करो!
 
Therefore, raising my arms, I say again, O friends, leave aside false arguments and worship Sri Chaitanya and Nityananda!
तात्पर्य
क्योंकि जो व्यक्ति कृष्ण-भक्ति करता है लेकिन श्री कृष्ण चैतन्य और प्रभु नित्यानंद को नहीं समझता है, वह केवल अपना समय बर्बाद करेगा, लेखक, कृष्णदास कविराज गोस्वामी, सभी से श्री चैतन्य और नित्यानंद प्रभु और पंच-तत्व की पूजा करने का अनुरोध करते हैं। वह सभी को आश्वासन देते हैं कि जो व्यक्ति ऐसा करता है वह कृष्ण चैतन्य में सफल होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)