Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.8.12 
हेन कृपामय चैतन्य ना भजे येइ जन ।
सर्वोत्तम हइलेओ तारे असुरे गणन ॥12॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति इन दयालु भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रति आदर नहीं दिखाता अथवा उनकी पूजा नहीं करता, उसे राक्षस ही समझना चाहिए, भले ही वह मानव समाज में बहुत ऊंचा स्थान रखता हो।
 
A person who does not respect or worship the merciful Lord, Chaitanya Mahaprabhu, should be considered an asura, no matter how respected he may be in human society.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती महाराज इस संदर्भ में कहते हैं, "हे जीवो, बस कृष्ण चेतना में ही लिप्त हो जाओ, यही श्री चैतन्य महाप्रभु का संदेश है।" भगवान चैतन्य ने कृष्ण चेतना के दर्शन को अपने आठ श्लोकों में, या शिक्षाष्टक के रूप में बताते हुए इसका प्रचार किया। उन्होंने कहा, "इहा हाइटे सर्व सिद्धि हैबे सबारा": "हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने से, जीवन में सभी पूर्णता प्राप्त की जा सकती है।" इसलिए जो उनका सम्मान नहीं करता है या उनके दयालु इशारों के बाद भी उनकी दया की सराहना नहीं कर सकता है, वह असुर या सच्ची भक्ति के विरोधी है, भले ही वह मानव समाज में बहुत ऊँचा हो। असुर शब्द उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो भगवान विष्णु की परमेश्वर भक्ति के खिलाफ है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब तक कोई श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा नहीं करता है, तब तक कृष्ण का भक्त बनना बेकार है, और जब तक कोई कृष्ण की पूजा नहीं करता है, तब तक श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्त बनना भी बेकार है। ऐसी भक्ति को कलियुग का परिणाम समझना चाहिए। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस संबंध में कहते हैं कि नास्तिक स्मार्त,या पाँच प्रकार के देवताओं के उपासक भगवान विष्णु की पूजा भौतिक सफलता में थोड़ी संतुष्टि के लिए करते हैं, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए उनका कोई सम्मान नहीं है। उन्हें साधारण जीवों में से एक समझकर वह गौरसुंदर और श्री कृष्ण में भेद करते हैं। ऐसी समझ भी आसुरी है और आचार्यों के निष्कर्ष के विरुद्ध है। ऐसा निष्कर्ष कलियुग का परिणाम है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)