यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिस्तु भवति भारत।
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम्॥
"हे भरत के वंशज, जब-जब धर्म की हानि होगी और अधर्म का अधिक प्रसार होगा, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होऊँगा।" कृष्ण हमेशा बहुत तरह से जीवों की रक्षा करते हैं। वे स्वयं आते हैं, वे अपने प्रिय भक्तों को भेजते हैं, और अपने बाद शास्त्र छोड़ जाते हैं, जैसे भगवद्-गीता। क्यों? ताकि मनुष्य माया के घेरे से मुक्त होने के वरदान का लाभ उठा सकें। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसलिए संन्यास स्वीकार किया ताकि एक मूर्ख व्यक्ति भी जो उन्हें एक साधारण संन्यासी के रूप में स्वीकार करेगा उनका सम्मान करेगा, क्योंकि यह उनके भौतिक कष्टों को कम करने और अंततः उन्हें भौतिक घेरे से मुक्त करने में मदद करेगा। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती इस संबंध में बताते हैं कि श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु श्री राधा और कृष्ण का संयुक्त रूप है (महाप्रभु श्री चैतन्य, राधा कृष्ण नहीं अन्य)। इसलिए जब मूर्खों ने चैतन्य महाप्रभु को एक साधारण व्यक्ति मान लिया और इस तरह उनका अपमान किया, तो दयालु भगवान ने इन अपराधियों को मुक्त करने के लिए, संन्यास स्वीकार किया ताकि वे उन्हें प्रणाम करें, उन्हें संन्यासी के रूप में स्वीकार करें। श्री चैतन्य महाप्रभु ने आम लोगों पर अपनी महान दया का वरदान देने के लिए संन्यास स्वीकार किया था, जो उन्हें स्वयं राधा और कृष्ण के रूप में नहीं समझ सकते हैं।
