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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.8.10 
मोरे ना मानिले सब लोक हबे नाश ।
इथि ला गि’ कृपार्द्र प्रभु करिल सन्न्यास ॥10॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा, “यदि लोग मुझे स्वीकार नहीं करेंगे तो वे सब नष्ट हो जायेंगे।” इस प्रकार दयालु भगवान ने संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu thought, “Unless people accept me, they will perish.” So the merciful Mahaprabhu took sannyasa.
तात्पर्य
श्रीमद- भागवतम् (12.3.51) में कहा गया है , कीर्तिनाद एव कृष्णस्य मुक्त- सँगः परमं व्रजेतः : " सिर्फ़ हरे कृष्ण मंत्र या भगवान कृष्ण के नाम के जप से ही कोई मुक्त होकर घर लौटता है, वापस परमात्मा के पास |" यह कृष्ण चेतना भगवन चैतन्य महाप्रभु की कृपा से प्राप्त होनी चाहिए | कोई भी कृष्ण चेतना में पूर्ण नहीं हो सकता जब तक वह श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके सहयोगियों को सफलता के एकमात्र माध्यम के रूप में स्वीकार ना कर ले | इन विचारों के कारण ही भगवान ने संन्यास स्वीकार किया , इस प्रकार लोग उन्हें सम्मान देंगे और बहुत जल्दी कृष्ण चेतना के मंच पर पहुँच जाएंगे | चूकि भगवान चैतन्य महाप्रभु , जो की स्वयं कृष्ण है , ने कृष्ण चेतना आंदोलन का उद्घाटन किया , तब तक उनकी कृपा के बिना कोई भी कृष्ण चेतना के पारलौकिक मंच पर नहीं चढ़ सकता |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)