Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.6.43 
सेइ अभिमान - सुखे आपना पासरे ।
‘कृष्ण - दास’ हओ - जीवे उपदेश करे ॥43॥
 
 
अनुवाद
वे उस गर्भाधान के आनंद में स्वयं को भूल जाते हैं और सभी जीवों को सिखाते हैं, "तुम श्री चैतन्य महाप्रभु के सेवक हो।"
 
He forgets himself in the joy of that feeling and teaches all living beings, “All of you are servants of Sri Chaitanya Mahaprabhu.”
तात्पर्य
सर्वोच्च भगवान के प्रति पारलौकिक भक्तिपूर्ण सेवा इतनी सुखद है कि स्वयं भगवान भी एक भक्त की भूमिका निभाते हैं। स्वयं को सर्वोच्च भूलकर, वे व्यक्तिगत रूप से पूरी दुनिया को सिखाते हैं कि सर्वोच्च भगवान की सेवा कैसे की जाए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)