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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.6.40 
माधवेन्द्र - पुरीर इँहो शिष्य, एइ ज्ञाने ।
आचार्य - गोसाञि रे प्रभु गुरु करि’ माने ॥40॥
 
 
अनुवाद
यह सोचकर कि "वे [श्री अद्वैत आचार्य] श्री माधवेन्द्र पुरी के शिष्य हैं," भगवान चैतन्य उनकी आज्ञा का पालन करते हैं, तथा उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते हैं।
 
Chaitanya Mahaprabhu, thinking that he (Sri Advaita Acharya) is the disciple of Sri Madhavendra Puri, respects him as his guru and obeys his orders.
तात्पर्य
श्री माधवेन्द्र पुरी माधवाचार्य से शिष्य परंपरा के आचार्यों में से एक हैं। माधवेन्द्र पुरी के दो प्रमुख शिष्य थे, ईश्वर पुरी और श्री अद्वैत प्रभु। इसलिए गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदाय माधवाचार्य से एक शिष्य परंपरा है। इस तथ्य को गौरा-गणोद्देश-दीपिका और प्रमेय-रत्नावली नामक अधिकृत पुस्तकों में स्वीकार किया गया है, साथ ही गोपाल गुरु गोस्वामी द्वारा भी। गौरा-गणोद्देश-दीपिका (22) स्पष्ट रूप से गौड़ीय वैष्णवों के शिष्य उत्तराधिकार को बताता है: "भगवान ब्रह्मा आध्यात्मिक आकाश के भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष शिष्य हैं। उनके शिष्य नारद हैं, नारद के शिष्य व्यास हैं और व्यास के शिष्य शुकदेव गोस्वामी और माधवाचार्य हैं। पद्मनाभ आचार्य माधवाचार्य के शिष्य हैं और नरहरि पद्मनाभ आचार्य के शिष्य हैं। माधव नरहरि के शिष्य हैं अक्षोभ्य माधव के प्रत्यक्ष शिष्य हैं, और जयतीर्थ अक्षोभ्य के शिष्य हैं। जयतीर्थ के शिष्य ज्ञानसिंधु हैं, और उनके शिष्य महानिधि हैं। विद्यानिधि महानिधि के शिष्य हैं, और राजेंद्र विद्यानधि के शिष्य हैं। जयधर्मा राजेंद्र के शिष्य हैं। पुरुषोत्तम जयधर्मा के शिष्य हैं। श्रीमान लक्ष्मीपति व्यासतीर्थ के शिष्य हैं, जो पुरुषोत्तम के शिष्य हैं। और माधवेन्द्र पुरी लक्ष्मीपति के शिष्य हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)