शास्त्रेर सिद्धान्त एइ , - विज्ञेर अनुभव ।
मूढ़ - लोक नाहि जाने भावेर वैभव ॥104॥
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अनुवाद
शास्त्रों का यह निष्कर्ष भी अनुभवी भक्तों की ही अनुभूति है। किन्तु मूर्ख और धूर्त लोग भक्ति भावना के ऐश्वर्य को नहीं समझ सकते।
This conclusion of the authentic scriptures is also the experience of experienced devotees. However, foolish and cunning people cannot understand this splendor of devotional sentiments.
तात्पर्य
हिंदी-लेख: जब कोई व्यक्ति सारूप्य मुक्ति रुप में मुक्त होता है, जिसमें उसकी आध्यात्मिक आकृति हू-ब-हू विष्णु की तरह होती है, तो उसके लिए कृष्ण के घनिष्ठ सहयोगियों और उनके मधुर आदान-प्रदान का अनुभव करना संभव नहीं होता। हालाँकि, कृष्ण के भक्त, कृष्ण के साथ अपने प्रेमपूर्ण संबंधों में कभी-कभी अपनी पहचान भूल जाते हैं; कभी-कभी वे स्वयं को कृष्ण के साथ एक समझ लेते हैं और फिर भी उस तरह और भी महानतर दिव्य आनंद का रसास्वादन करते हैं। सामान्य लोग, केवल अपनी मूर्खता के कारण, प्रभु की सेवा करने की दिव्य आनंद को भूलकर हर चीज़ के स्वामी बनने का प्रयास करते हैं। हालाँकि, जब कोई व्यक्ति वास्तव में आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत होता है, तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के प्रभु की दिव्य सेवा स्वीकार कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥