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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.5.89 
आमि त’ जगते वसि, जगतामाते ।
ना आमि जगते वसि, ना आमा जगते ॥89॥
 
 
अनुवाद
[भगवान कृष्ण ने कहा:] "मैं भौतिक जगत में स्थित हूँ और जगत मुझमें स्थित है। किन्तु साथ ही मैं भौतिक जगत में स्थित नहीं हूँ और न ही यह वास्तव में मुझमें स्थित है।
 
(Lord Krishna said:) "I am situated in the material world, and this world is dependent on me. However, at the same time, I am neither situated in the material world, nor is it truly dependent on me.
तात्पर्य
जब तक ईश्वर की इच्छा से ऊर्जा न मिले तब तक अस्तित्व में कुछ भी संभव नहीं है। इसलिए, पूरी प्रकट सृष्टि भगवान की ऊर्जा पर टिकी हुई है, लेकिन इसलिए कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता कि भौतिक अभिव्यक्ति परमेश्वर के व्यक्तित्व के समान है। आकाश में बादल हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आकाश और बादल एक ही हैं। इसी प्रकार, गुणात्मक भौतिक प्रकृति और उसके उत्पाद परमेश्वर के साथ कभी भी समान नहीं होते हैं। भौतिक प्रकृति या माया पर शासन करने की प्रवृत्ति परमेश्वर का गुण नहीं हो सकता है। जब वह भौतिक दुनिया में उतरते हैं, तो भौतिक गुणों से अप्रभावित अपनी अलौकिक प्रकृति को बनाए रखते हैं। आध्यात्मिक और भौतिक दोनों दुनिया में, वह हमेशा सभी ऊर्जाओं के नियंत्रक होते हैं। अछूती आध्यात्मिक प्रकृति हमेशा उनमें रहती है। अपनी विहार की क्रीडाओं के लिए भगवान भौतिक दुनिया में विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं और गायब हो जाते हैं, फिर भी वह सभी ब्रह्मांडीय अभिव्यक्तियों के स्रोत हैं।

भौतिक अभिव्यक्ति परमेश्वर के बिना अलग से अस्तित्व में नहीं रह सकती। फिर भी भगवान विष्णु, परमेश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व, भौतिक प्रकृति के साथ अपने संबंध के बावजूद, प्रकृति के प्रभाव के अधीनस्थ नहीं हो सकते। उनका शाश्वत आनंद और ज्ञान का मूल रूप भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अधीन कभी नहीं होता है। यह परमेश्वर की अकल्पनीय शक्तियों की एक विशिष्ट विशेषता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)