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श्लोक 1.5.88  |
एइ मत गीतातेह पुनः पुनः कय ।
सर्वदा ईश्वर - तत्त्व अचिन्त्य - शक्ति हय ॥88॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार भगवद्गीता भी बार-बार कहती है कि परम सत्य में सदैव अकल्पनीय शक्ति होती है। |
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| Thus Bhagavad Gita also repeatedly says that the ultimate truth always has inconceivable power. |
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