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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.5.84 
जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः ।
सम्भूतं षोड़श - कलमादौ लोक - सिसृक्षया ॥84॥
 
 
अनुवाद
सृष्टि के आरंभ में, भगवान ने पुरुष अवतार के रूप में, भौतिक सृष्टि के सभी अवयवों के साथ, अपना विस्तार किया। सर्वप्रथम उन्होंने सृष्टि के लिए उपयुक्त सोलह प्रमुख शक्तियों की रचना की। इसका उद्देश्य भौतिक ब्रह्मांडों को प्रकट करना था।
 
"At the beginning of creation, the Lord expanded Himself in the form of the Purusha avatara, along with all the elements (upādānas) of the material universe. First, He created the sixteen primary energies suitable for creation. He did this for the purpose of manifesting the material universes."
तात्पर्य
यह श्रीमद्भगवतम (1.3.1) का एक श्लोक है। श्रीमद्भवगतम पर माध्व का विवरण यह बताता है कि निम्नलिखित सोलह आध्यात्मिक ऊर्जाएँ आध्यात्मिक जगत में उपस्थित हैं: (1) श्री, (2) भू, (3) लीला, (4) कांति, (5) कीर्ति, (6) तुष्टि, (7) गीर, (8) पुष्टि, (9) सत्य (10) ज्ञानाज्ञान, (11) जया उत्कर्षिणी, (12) विमला, (13) योगमाया, (14) प्रह्वी, (15) ईशान, और (16) अनुग्रहा। लघु - भागवतामृत पर उनके विवरण में, श्री बलदेव विद्याभूषण ने बताया है कि उर्ध्व ऊर्जाओं को नौ नामों से जाना जाता है: (1) विमला, (2) उत्कर्षिणी (3) ज्ञाना, (4) क्रिया, (5) योगा, (6) प्रह्वी, (7) सत्य, (8) ईशान, और (9) अनुग्रहा। श्रील जीव गोस्वामी के भगवत्-संदर्भ में (टेक्स्ट 117) उनका वर्णन श्री, पुष्टि, गिर, कांति, कीर्ति, तुष्टि, इला, जया; विद्याविद्या, माया, संवित, संधिनी, ह्लादिनी, भक्ति, मूर्ति, विमला, योगा, प्रह्वी, ईशान, अनुग्रहा आदि के रूप में किया गया है। ये सभी ऊर्जाएँ भगवान के वर्चस्व के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)