श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  1.5.77 
एकं तु महतः स्रष्ट द्वितीयं त्वण्ड - संस्थितम् ।
तृतीयं सर्व - भूत - स्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते ॥77॥
 
 
अनुवाद
"विष्णु के तीन रूप हैं जिन्हें पुरुष कहा जाता है। प्रथम, महाविष्णु, समस्त भौतिक ऊर्जा [महत्] के रचयिता हैं, दूसरे गर्भोदशायी हैं, जो प्रत्येक ब्रह्मांड में स्थित हैं, और तीसरे क्षीरोदशायी हैं, जो प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं। जो इन तीनों को जान लेता है, वह माया के बंधन से मुक्त हो जाता है।"
 
"Vishnu has three forms, called Purusha. The first form is Mahavishnu, the creator of all material energy (mahat); the second form is Garbhodakashayi, who resides in every universe; and the third form is Kshirodakashayi, who resides in the heart of every living being. One who knows these three becomes free from the clutches of Maya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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