सङ्कर्षणः कारण - तोय - शायी गर्भोद - शायी च पयोब्धि - शायी ।
शेषश्च यस्यांश - कलाः स नित्या - नन्दाख्य - रामः शरणं ममास्तु ॥7॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
श्री नित्यानंद राम मेरे निरन्तर स्मरण के विषय बनें। संकर्षण, शेषनाग तथा कारण सागर, गर्भ सागर और क्षीरसागर में स्थित विष्णु उनके पूर्ण अंश तथा उनके पूर्ण अंशों के अंश हैं।
May that Sri Nityananda Rama be the object of my constant remembrance, whose parts and portions are Sankarshana, Sheshnag and Vishnu, who sleep in the Causal Ocean, Garbha Ocean and Ksheer Ocean respectively.
तात्पर्य
श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने अपने डायरी में प्रभु नित्यानंद प्रभु को अपने सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करने के लिए इस श्लोक को दर्ज किया है। यह श्लोक श्री चैतन्य चरितामृत के पहले चौदह श्लोकों के सातवें के रूप में भी प्रकट होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥