यथोलमुखाद् विस्फुलिङ्गाध् धूमाद् वापि स्वसंभवत्
अपि आत्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथग उल्मुकात्
"हालांकि धुआं, ज्वलनशील लकड़ी और चिंगारियों को एक साथ आग के अवयवों के रूप में माना जाता है, फिर भी ज्वलनशील लकड़ी आग से अलग है, और धुआं ज्वलनशील लकड़ी से अलग है।" भौतिक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, आदि) धुएं की तरह हैं, जीवित संस्थाएं चिंगारियों की तरह हैं और प्रधान के रूप में भौतिक प्रकृति ज्वलनशील लकड़ी की तरह है। लेकिन वे सभी मिलकर भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से शक्ति प्राप्त करते हैं और इस प्रकार अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं को प्रकट करने में सक्षम होते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सभी अभिव्यक्तियों का मूल है। भौतिक प्रकृति तभी आपूर्ति कर सकती है जब उसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की नज़र से सक्रिय किया जाए।
जिस तरह एक महिला किसी पुरुष के वीर्य से गर्भवती होने के बाद बच्चे को जन्म दे सकती है, उसी तरह भौतिक प्रकृति महा विष्णु की निगाह से आने के बाद भौतिक तत्वों की आपूर्ति कर सकती है। इसलिए प्रधान भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की देखरेख से स्वतंत्र नहीं हो सकता है। भगवद गीता (9.10) में इसकी पुष्टि की गई है: मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सा-चराचरम। प्रकृति, कुल भौतिक ऊर्जा, भगवान की देखरेख में कार्य करती है। भौतिक तत्वों का मूल स्रोत कृष्ण है। इसलिए नास्तिक सांख्य दार्शनिकों द्वारा भौतिक प्रकृति को इन तत्वों का स्रोत मानने का प्रयास, कृष्ण को भूलकर, बेकार है, जैसे बकरी की गर्दन पर लटकी त्वचा की निप्पल जैसी गांठों से दूध निकालने की कोशिश करना।
