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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  1.5.61 
अतएव कृष्ण मूल - जगत्कारण ।
प्रकृति कारण यैछे अजा - गल - स्तन ॥61॥
 
 
अनुवाद
अतः भगवान कृष्ण ही इस ब्रह्माण्डीय जगत के मूल कारण हैं। प्रकृति बकरी की गर्दन के स्तनों के समान है, क्योंकि वे दूध नहीं दे सकते।
 
Therefore, Lord Krishna is the root cause of the existence of this universe. Nature is like the breasts of a goat hanging from its neck, but they do not produce milk.
तात्पर्य
प्रधान या प्रकृति के घटक-आपूर्ति करने वाले भाग और माया के कारणात्मक भाग से युक्त बाहरी ऊर्जा को माया-शक्ति के रूप में जाना जाता है। निष्क्रिय भौतिक प्रकृति भौतिक अभिव्यक्ति का वास्तविक कारण नहीं है, क्योंकि कार्णार्णवशायी, महा-विष्णु, कृष्ण का पूर्ण विस्तार, सभी अवयवों को सक्रिय करता है। इसी तरह से भौतिक प्रकृति में सामग्री की आपूर्ति करने की शक्ति है। दिया गया उदाहरण यह है कि लोहे में न तो गर्म करने की शक्ति है और न ही जलाने की, लेकिन आग के संपर्क में आने के बाद लोहा लाल-गर्म हो जाता है और फिर गर्मी को फैला सकता है और अन्य चीजों को जला सकता है। भौतिक प्रकृति लोहे की तरह है, क्योंकि विष्णु के स्पर्श के बिना उसके पास कार्य करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है, जिसकी तुलना आग से की जाती है। भगवान विष्णु अपनी नज़र की शक्ति से भौतिक प्रकृति को सक्रिय करते हैं और फिर लोहे जैसी भौतिक प्रकृति एक भौतिक-आपूर्ति करने वाला एजेंट बन जाती है जैसे लाल-गर्म किया गया लोहा एक जलता हुआ एजेंट बन जाता है। भौतिक प्रकृति स्वतंत्र रूप से भौतिक सामग्री की आपूर्ति करने के लिए एक एजेंट नहीं बन सकती है। इसे श्रीमद्-भागवतम (3.28.40) में भगवान के अवतार श्री कपिलदेव द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से समझाया गया है:

यथोलमुखाद् विस्फुलिङ्गाध् धूमाद् वापि स्वसंभवत्

अपि आत्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथग उल्मुकात्

"हालांकि धुआं, ज्वलनशील लकड़ी और चिंगारियों को एक साथ आग के अवयवों के रूप में माना जाता है, फिर भी ज्वलनशील लकड़ी आग से अलग है, और धुआं ज्वलनशील लकड़ी से अलग है।" भौतिक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, आदि) धुएं की तरह हैं, जीवित संस्थाएं चिंगारियों की तरह हैं और प्रधान के रूप में भौतिक प्रकृति ज्वलनशील लकड़ी की तरह है। लेकिन वे सभी मिलकर भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से शक्ति प्राप्त करते हैं और इस प्रकार अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं को प्रकट करने में सक्षम होते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सभी अभिव्यक्तियों का मूल है। भौतिक प्रकृति तभी आपूर्ति कर सकती है जब उसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की नज़र से सक्रिय किया जाए।

जिस तरह एक महिला किसी पुरुष के वीर्य से गर्भवती होने के बाद बच्चे को जन्म दे सकती है, उसी तरह भौतिक प्रकृति महा विष्णु की निगाह से आने के बाद भौतिक तत्वों की आपूर्ति कर सकती है। इसलिए प्रधान भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की देखरेख से स्वतंत्र नहीं हो सकता है। भगवद गीता (9.10) में इसकी पुष्टि की गई है: मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सा-चराचरम। प्रकृति, कुल भौतिक ऊर्जा, भगवान की देखरेख में कार्य करती है। भौतिक तत्वों का मूल स्रोत कृष्ण है। इसलिए नास्तिक सांख्य दार्शनिकों द्वारा भौतिक प्रकृति को इन तत्वों का स्रोत मानने ​​का प्रयास, कृष्ण को भूलकर, बेकार है, जैसे बकरी की गर्दन पर लटकी त्वचा की निप्पल जैसी गांठों से दूध निकालने की कोशिश करना।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)