Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.5.41 
वासुदेव - सङ्कर्षण - प्रद्युम्नानिरुद्ध ।
‘द्वितीय चतुर्व्यह’ एइ - तुरीय, विशुद्ध ॥41॥
 
 
अनुवाद
वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इस द्वितीय चतुर्भुज का निर्माण करते हैं। वे पूर्णतः दिव्य हैं।
 
This second quartet includes Vasudeva, Sankarshana, Pradyumna, and Aniruddha. They are absolutely divine.
तात्पर्य
42वें अध्याय के दूसरे खंड में वेदांत-सूत्र के सूत्र की व्याख्या करते हुए श्रीपद शंकराचार्य ने भ्रामक रूप से चतुर्व्यूह रूप की व्याख्या की है (उत्पत्ति- असंभवात)। श्री चैतन्य-चरितामृत के इस अध्याय के पद 41 से लेकर 47 तक, श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने परम सत्य के व्यक्तिगत स्वरूप पर शंकराचार्य की भ्रामक आपत्तियों का उत्तर दिया है।

परमेश्वर, परम सत्य, किसी भौतिक वस्तु की तरह नहीं है जिसे प्रायोगिक ज्ञान या इंद्रियग्राह्यता से जाना जा सके। नारद-पंचरात्र में इस तथ्य को स्वयं भगवान नारायण ने भगवान शिव को समझाया है। लेकिन शंकराचार्य, अपने स्वामी नारायण के निर्देश पर, शिव के अवतार, को अद्वैतवादियों को गुमराह करना पड़ा, जो अंतिम विलुप्ति का समर्थन करते हैं। अस्तित्व की बाध्य अवस्था में, सभी जीवधारियों में चार बुनियादी दोष हैं, जिनमें से एक धोखा देने की प्रकृति है। शंकराचार्य ने अद्वैतवादियों को गुमराह करने के लिए धोखा देने की इस प्रवृत्ति को चरम पर ले गए हैं।

वास्तव में, वैदिक साहित्य में चतुर्व्यूह रूपों की व्याख्या किसी बाध्य आत्मा के अनुमान से समझी नहीं जा सकती। इसलिए चतुर्व्यूह रूपों को वैसा ही स्वीकार किया जाना चाहिए जैसा उनका वर्णन किया गया है। वेदों का अधिकार ऐसा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी सीमित धारणा से कुछ नहीं समझ पाता है तब भी उसे वैदिक आदेशों को स्वीकार करना चाहिए न कि अपनी अपूर्ण समझ के अनुकूल व्याख्याएँ नहीं करनी चाहिए। हालाँकि, अपने शारीरक-भाष्य में शंकराचार्य ने अद्वैतवादियों की गलतफहमी को बढ़ाया है।

चतुर्व्यूह रूपों का एक आध्यात्मिक अस्तित्व है जिसे वासुदेव-सत (शुद्ध-सत) या अयोग्य गुण में महसूस किया जा सकता है, जो वासुदेव की समझ में पूर्ण तल्लीनता के साथ आता है। चतुर्व्यूह रूप, जो भगवान के छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, आंतरिक शक्ति के उपभोक्ता हैं। भगवान को दरिद्र या शक्तिहीन मानना - या दूसरे शब्दों में, नपुंसक होना - केवल पाखंड है। यह पाखंड बाध्य आत्मा का पेशा है, और यह उसकी घबराहट को बढ़ाता है। जो व्यक्ति आध्यात्मिक दुनिया और भौतिक दुनिया के बीच के अंतर को नहीं समझ सकता, वह पारलौकिक चतुर्व्यूह रूपों की स्थिति की जांच करने या जानने के लिए योग्य नहीं है। वेदांत-सूत्र 2.2.42-45 पर अपनी टीका में, परम पावन श्रीपद शंकराचार्य ने आध्यात्मिक दुनिया में इन चतुर्व्यूह रूपों के अस्तित्व को रद्द करने का व्यर्थ प्रयास किया है।

शंकराचार्य कहते हैं (सूत्र 42) कि भक्त मानते हैं कि भगवान वासुदेव, श्री कृष्ण, एक हैं, भौतिक गुणों से मुक्त हैं और आनंद और शाश्वत अस्तित्व से भरे हुए एक पारलौकिक शरीर हैं। वह भक्तों का अंतिम लक्ष्य है, जो मानते हैं कि भगवान स्वयं को चार अन्य शाश्वत पारलौकिक रूपों - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध में विस्तारित करते हैं। वासुदेव, जो प्राथमिक विस्तार है, से संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध क्रम से आते हैं। वासुदेव का दूसरा नाम परमात्मा है, संकर्षण का दूसरा नाम जीव (जीवित प्राणी) है, प्रद्युम्न का दूसरा नाम मन है, और अनिरुद्ध का दूसरा नाम अहंकार (झूठा अहं) है। इन विस्तारों में से, वासुदेव को भौतिक प्रकृति की उत्पत्ति माना जाता है। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध उस मूल कारण की रचना होनी चाहिए।

महान आत्माओं का कहना है कि नारायण, जिसे परमात्मा या अध्यात्म कहा जाता है, भौतिक प्रकृति से परे हैं, और यह वैदिक साहित्य के कथनों के अनुसार ही है। मायावादी भी इस बात से सहमत हैं कि नारायण स्वयं को विविध रूपों में विस्तारित कर सकते हैं। शंकराचार्य कहते हैं कि वह भक्तों की समझ के उस अंश पर बहस करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इस विचार का विरोध करना होगा कि संकर्षण वासुदेव से उत्पन्न हुए, प्रद्युम्न संकर्षण से उत्पन्न हुए और अनिरुद्ध प्रद्युम्न से उत्पन्न हुए, क्योंकि यदि संकर्षण को वासुदेव के शरीर से निर्मित जीवों का प्रतिनिधित्व करने के रूप में समझा जाता है, तो जीवों को नित्य नहीं होना पडे़गा। जीवों को भगवान की दीर्घकालिक मंदिर पूजा, वैदिक साहित्य को पढ़ने और भगवान को प्राप्त करने के लिए योग और धार्मिक गतिविधियों में संलग्न होकर भौतिक प्रदूषण से मुक्त होना चाहिए। लेकिन अगर जीवों को एक निश्चित समय पर भौतिक प्रकृति से बनाया गया होता, तो वे नित्य नहीं होते और उन्हें मुक्ति पाने और भगवान के साथ जुड़ने का कोई मौका नहीं मिलता। जब किसी कारण को समाप्त कर दिया जाता है, तो उसके परिणाम भी समाप्त हो जाते हैं। वेदांत-सूत्र के दूसरे खंड के दूसरे अध्याय में, आचार्य वेदव्यास ने इस अवधारणा का भी खंडन किया है कि जीव कभी पैदा हुए थे (नात्मश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्याः)। क्योंकि जीवों के लिए कोई सृजन नहीं है, वे निश्चित रूप से नित्य होगें।

शंकराचार्य कहते हैं (सूत्र 43) कि भक्त सोचते हैं कि प्रद्युम्न, जिसे इंद्रियों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है, संकर्षण से उत्पन्न हुआ है, जिसे जीवों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है। लेकिन हम वास्तव में अनुभव नहीं कर सकते कि कोई व्यक्ति इंद्रियों का उत्पादन कर सकता है। भक्त यह भी कहते हैं कि प्रद्युम्न से अनिरुद्ध उत्पन्न हुआ है, जिसे अहंकार का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है। लेकिन शंकराचार्य कहते हैं कि जब तक भक्त यह नहीं दिखा सकते कि अहंकार और ज्ञान के साधन किसी व्यक्ति से कैसे उत्पन्न हो सकते हैं, तब तक वेदांत-सूत्र की ऐसी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई अन्य दार्शनिक सूत्रों को उस तरह से स्वीकार नहीं करता है।

शंकराचार्य भी (सूत्र 44) कहते हैं कि वह भक्तों के इस विचार को स्वीकार नहीं कर सकते कि संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ज्ञान, सम्पत्ति, शक्ति, यश, सौंदर्य और वैराग्य के छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण, परम भगवान के समान ही शक्तिशाली हैं, और किसी निश्चित बिंदु पर उत्पत्ति के दोष से मुक्त हैं। भले ही वे सम्पूर्ण विस्तार हैं, उत्पत्ति का दोष बना रहता है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, भिन्न-भिन्न व्यक्ति होने के कारण, एक नहीं हो सकते। इसलिए यदि उन्हें पूर्ण, सम और बराबर स्वीकार किया जाए, तो भगवान के कई व्यक्तित्व होने चाहिए। लेकिन यह स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि भगवान के कई व्यक्तित्व हैं, क्योंकि सभी उद्देश्यों के लिए एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की स्वीकृति पर्याप्त है। एक से अधिक ईश्वर की स्वीकृति इस निष्कर्ष के विपरीत है कि भगवान वासुदेव, परम भगवान, बिना किसी दूसरे के हैं। भले ही हम यह स्वीकार करने के लिए सहमत हों कि भगवान के चौगुने रूप सभी समान हैं, हम गैर-शाश्वतता के अतार्किक दोष से नहीं बच सकते। जब तक हम यह स्वीकार नहीं करते कि व्यक्तित्वों में कुछ अंतर हैं, तो इस विचार का कोई अर्थ नहीं है कि संकर्षण वासुदेव का विस्तार है, प्रद्युम्न संकर्षण का विस्तार है, और अनिरुद्ध प्रद्युम्न का विस्तार है। कारण और प्रभाव के बीच कोई अंतर होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक घड़ा उस मिट्टी से अलग होता है जिससे यह बना होता है, और इसलिए हम यह पता लगा सकते हैं कि मिट्टी कारण है और घड़ा प्रभाव है। इस तरह के भेद के बिना कारण और प्रभाव का कोई अर्थ नहीं है। इसके अलावा, पंचरात्रिक सिद्धांतों के अनुयायी वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के बीच ज्ञान और गुणों में कोई अंतर स्वीकार नहीं करते हैं। भक्त इन सभी विस्तारों को एक मानते हैं, लेकिन उन्हें एकता को इन चौगुने विस्तारों तक ही सीमित क्यों करना चाहिए? निश्चित रूप से हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मा से लेकर नगण्य चींटी तक सभी जीव वासुदेव के विस्तार हैं, जैसा कि सभी श्रुतियों और स्मृतियों में स्वीकार किया गया है।

शंकराचार्य यह भी कहते हैं (सूत्र 45) कि पंचरात्र का अनुसरण करने वाले भक्त कहते हैं कि भगवान के गुण और स्वयं भगवान, गुणों के स्वामी के रूप में, एक ही हैं। लेकिन भगवत स्कूल यह कैसे कह सकता है कि छह ऐश्वर्य-ज्ञान, धन, शक्ति, यश, सौंदर्य और वैराग्य-भगवान वासुदेव के समान हैं? यह असंभव है। अपने लघु-भागवतामृत (पूर्व 5.165-193) में, श्रील रूप गोस्वामी ने श्रीपाद शंकराचार्य द्वारा भक्तों के खिलाफ वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के चौगुने रूपों के बारे में उनके स्पष्टीकरण के संबंध में लगाए गए आरोपों का खंडन किया है। रूप गोस्वामी कहते हैं कि नारायण के ये चार विस्तार आध्यात्मिक आकाश में विद्यमान हैं, जहां वे महावस्था के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनमें से, वासुदेव की हृदय के भीतर ध्यान द्वारा पूजा की जाती है क्योंकि वह हृदय के प्रमुख देवता हैं, जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (4.3.23) में बताया गया है।

संकर्षण, दूसरा विस्तार, विहारों के लिए वासुदेव का व्यक्तिगत विस्तार है, और चूंकि वह सभी जीवित प्राणियों का भंडार है, इसलिए उन्हें कभी-कभी जीव कहा जाता है। संकर्षण की सुंदरता प्रकाश किरणों का उत्सर्जन करने वाले असंख्य पूर्ण चन्द्रमाओं से भी अधिक है। वह अहंकार के सिद्धांत के रूप में पूजनीय हैं। उन्होंने अनंतदेव को धारण करने की सभी शक्तियों से निवेश किया है। सृष्टि के विघटन के लिए, वह खुद को रुद्र में, अधर्म (अधर्म के व्यक्तित्व) में, सर्प (सांप) में, अंतक (यमराज, मृत्यु के देवता) में और राक्षसों में भी प्रकट करते हैं।

प्रद्युम्न, तीसरा अवतार, सांकर्षण से प्रकट होता है। जो विशेष रूप से बुद्धिमान हैं वे सांकर्षण के इस प्रद्युम्न विस्तार की पूजा बुद्धि के सिद्धांत के रूप में करते हैं। भाग्य की देवी इलावृत-वर्ष के रूप में ज्ञात स्थान पर हमेशा प्रद्युम्न के गुणों का जाप करती है, और वह हमेशा उनकी बड़ी भक्ति से सेवा करती है। उनका रंग कभी सुनहरा और कभी आकाश में नए मानसून बादलों की तरह नीला दिखाई देता है। वह भौतिक दुनिया के निर्माण के मूल हैं, और उन्होंने कामदेव में अपने रचनात्मक सिद्धांत का निवेश किया है। यह केवल उनके निर्देश पर है कि सभी पुरुष और देवता और अन्य जीव ऊर्जा के साथ पुनर्जनन के लिए कार्य करते हैं।

चतुर्गुण विस्तार के चौथे, अनिरुद्ध की पूजा महान ऋषियों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा मन के सिद्धांत के रूप में की जाती है। उनका रंग नीले बादल के नीले रंग के समान है। वह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के रखरखाव में संलग्न है और धर्म (धार्मिकता के देवता), मनु (मानव जाति के पूर्वज) और देवताओं (देवताओं) की परमात्मा हैं। मोक्ष-धर्म वैदिक शास्त्र बताता है कि प्रद्युम्न संपूर्ण मन के देवता हैं, जबकि अनिरुद्ध संपूर्ण अहंकार के देवता हैं, लेकिन चतुर्भुज रूपों के बारे में पिछले बयानों की पुष्टि पंचरात्र तंत्र में सभी मामलों में की गई है।

लघु-भागवतामृत (पूर्व 5.86-100) में, भगवान के अचिंत्य सामर्थ्य की एक स्पष्ट व्याख्या है। शंकराचार्य के बयानों को नकारते हुए, महा-वराह पुराण घोषित करता है:

सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः

हानोपादान-रहिता नैव प्रकृति-जाः क्वचित

"भगवान के सभी विभिन्न विस्तार दिव्य और शाश्वत हैं, और ये सभी बार-बार भौतिक सृजन के सभी विभिन्न ब्रह्मांडों में उतरते हैं। उनके शरीर, अनंत काल, आनंद और ज्ञान से बने, चिरस्थायी हैं; उनके क्षय का कोई मौका नहीं है, क्योंकि वे भौतिक दुनिया की रचना नहीं हैं। उनके रूप केंद्रित आध्यात्मिक अस्तित्व हैं, जो हमेशा सभी आध्यात्मिक गुणों से परिपूर्ण और भौतिक संदूषण से रहित होते हैं।"

इन कथनों की पुष्टि करते हुए, नारद-पंचरात्रता जोर देकर कहता है:

मणिर्यथा विभागेन नील-पितादिभिर्युतः

रूप-भेदमवाप्नोति ध्यान-भेदात् तथैवाच्युतः

"अचूक भगवान पूजा के विभिन्न तरीकों के अनुसार अपने शरीर को विभिन्न तरीकों से प्रकट कर सकते हैं, जैसे कि वैदूर्य मणि नीले और पीले जैसे विभिन्न रंगों में खुद को प्रकट कर सकता है।" प्रत्येक अवतार अन्य सभी से अलग है। यह प्रभु की अचिंत्य शक्ति द्वारा संभव है, जिसके द्वारा वह एक साथ एक के रूप में, विभिन्न आंशिक रूपों के रूप में और इन आंशिक रूपों की उत्पत्ति के रूप में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। उनकी अचिंत्य शक्तियों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।

कृष्ण एक बिना किसी दूसरे के हैं, लेकिन वह खुद को विभिन्न शरीरों में प्रकट करते हैं, जैसा कि श्रीमद-भागवतम के दसवें सर्ग में नारद ने कहा है:

चित्रं बतैतद एकेन वपुषा युगपत् पृथक्

गृहेषु द्व्य-अष्ट-सहस्रं स्त्रिया एक उदावहत्

"यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि कैसे एक कृष्ण 16,000 रानियों को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिए 16,000 महलों में एक साथ अलग-अलग कृष्ण बन गए हैं।" (भाग। 10.69.2) पद्म पुराण भी बताता है:

स देवो बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः

एकী-भूय पुनः शेते निर्दोषो हरिर आदि-कृत

"भगवान के समान व्यक्तित्व, पुरुषोत्तम, मूल व्यक्ति, जो हमेशा भौतिक गुणों और संदूषण से रहित होता है, वह खुद को विभिन्न रूपों में प्रदर्शित कर सकता है और साथ ही एक रूप में लेट सकता है।"

श्रीमद-भागवतम के दसवें सर्ग में कहा गया है, यजन्ति त्वन-मयास त्वां वै बहु-मूर्ति-एका-मूर्तिकम: "हे मेरे प्रभु, यद्यपि आप स्वयं को विभिन्न प्रकार के रूपों में प्रकट करते हैं, आप एक बिना दूसरे के हैं। इसलिए शुद्ध भक्त आप पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं और केवल आपकी पूजा करते हैं।" (भाग। 10.40.7) कूर्म पुराण में कहा गया है:

अस्थूलश्चानणुश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः

अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्त-लोचनः

"ईश्वर एकाकी और भीड़भाड़ दोनों है, वह बड़ा होने पर भी सूक्ष्म हैं, वह रंगहीन होने पर भी काले रंग के हैं और उनकी आँखें लाल हैं।" ये सभी बातें भौतिक दृष्टि से परस्पर विरोधी लग सकती हैं, पर यदि हम यह समझें कि भगवान की असीम शक्तियाँ हैं तो हम उनको सदा संभव मान सकते हैं। हमारी वर्तमान अवस्था में हम आध्यात्मिक कार्य को और उनके होने को ढंग से नहीं समझ सकते पर भले ही वे भौतिक संदर्भ के हिसाब से अविश्वसनीय है, हमें ऐसी विरोधी अवस्थायो को नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

यद्यपि यह अविश्वसनीय लगता है, पर पूर्ण विरोधी तत्वों में मेल बैठाना ईश्वर के लिए संभव है। श्रीमद-भागवत इस बात को छठे स्कंध (6.9.34-37) में स्थापित करते हैं:

“हे मेरे प्रभु, आपके आनंद और आपके खेल सभी अविश्वसनीय लगते हैं क्योंकि वे भौतिक विचारों के कारण और प्रभाव कार्यों से सीमित नहीं हैं। आप बिना किसी शारीरिक काम के सब कुछ कर सकते हैं। वेद कहते हैं कि पूर्ण सत्य में कई प्रकार की शक्तियां हैं और उसे किसी कार्य को व्यक्तिगत तौर पर करने की कोई जरूरत नहीं है। मेरे प्यारे भगवान, आप पूरी तरह से भौतिक गुणो से रहित हैं। आप पूरी तरह से गुणात्मक भौतिक अभिव्यक्ति को बनाने, बनाए रखने और विघटित कर सकते हैं, फिर भी ऐसे सभी कार्यों में आप नहीं बदलते हैं। आप अपने कार्यों के नतीजों को स्वीकार नहीं करते, सामान्य राक्षसों और देवताओं की तरह, जो भौतिक संसार में अपने कार्यों के नतीजों का आनंद उठाते हैं या दुख पाते हैं। काम के नतीजों से अप्रभावित, आप सदैव अपनी पूर्ण आध्यात्मिक शक्ति के साथ विद्यमान रहते हैं। हम इसे पूरी तरह से नहीं समझ सकते हैं।

“क्योंकि आप अपनी षड् ओपुलेंस में असीमित हैं, कोई भी आपके आध्यात्मिक गुणों को नहीं गिन सकता है। दार्शनिक और अन्य विचारशील व्यक्ति भौतिक संसार की विरोधी अभिव्यक्तियों और तार्किक तर्कों और निर्णयों के प्रस्तावों से अभिभूत हो जाते हैं। क्योंकि वे शब्दयुद्धों से चकित रह जाते हैं और शास्त्रों की विभिन्न व्याख्याओं से परेशान हो जाते हैं, उनके सिद्धांत आप तक नहीं पहुँच सकते, जो हर किसी के शासक और नियंत्रक हैं और जिनकी महिमा समझ से परे है।

“आपकी अविश्वसनीय शक्ति आपको सांसारिक गुणों से जोड़ कर रखती है। भौतिक चिंतन की सभी अवधारणाओं से परे, आपका पवित्र आध्यात्मिक ज्ञान आपको सभी सैद्धांतिक प्रक्रियाओं से परे रखता है। आपकी अविश्वसनीय शक्ति से, आपके अंदर कुछ भी विरोधाभासी नहीं है।

“लोग कभी कभी आपको निजी या सार्वजनिक रूप में सोच सकते हैं, पर आप एक हैं। जो लोग भ्रमित या चकित रह जाते हैं, रस्सी उनके सामने विभिन्न प्रकार के साँपों के रूप में प्रकट हो सकती है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों के लिए जो आपके बारे में अनिश्चित हैं, आप उनकी अनिश्चित अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न दार्शनिक तरीके बनाते हैं।"

हमें हमेशा आध्यात्मिक और भौतिक कार्य के बीच अंतर याद रखना चाहिए। सर्वोच्च भगवान, जो पूर्ण रूप से आध्यात्मिक हैं, किसी भी कार्य को बाहरी मदद के बिना कर सकते हैं। भौतिक संसार में, यदि हमें एक मिट्टी का बर्तन बनाना है, तो हमें उसको बनाने के लिए सामग्री, एक मशीन और एक मजदूर की आवश्यकता होती है। पर हमें इस विचार को सर्वोच्च प्रभु के कार्यों तक नहीं पहुँचाना चाहिए, क्योंकि वे हमारी अवधारणा में जो जरूरी प्रतीत होता है उसके बिना भी कुछ भी तुरंत बना सकते हैं। जब भगवान किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए अवतार लेते हैं, तो इससे यह संकेत नहीं मिलता है कि वे अवतार लिए बिना उस उद्देश्य को पूरा करने में असमर्थ हैं। वे केवल अपनी इच्छा से कुछ भी कर सकते हैं, पर अपनी अकारण दया से वे अपने भक्तों पर निर्भर प्रतीत होते हैं। वे यशोदामता के पुत्र के रूप में प्रकट नहीं होते क्योंकि वे उनकी देखभाल पर निर्भर हैं बल्कि क्योंकि वे अपनी अकारण दया से ऐसी भूमिका स्वीकार करते हैं। जब वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं, तो वे उनकी तरफ से स्वाभाविक रूप से परीक्षण और कष्ट स्वीकार करते हैं।

भगवद्-गीता में ऐसा कहा गया है कि भगवान, प्रत्येक जीवित प्राणी के प्रति समान रूप से अनुकूल रहते हुए, किसी से शत्रुता या मित्रता नहीं रखते हैं, लेकिन उनके लिए विशेष स्नेह रखते हैं जो सदैव प्रेम से उनके बारे में सोचते हैं। इसलिए भगवान के अलौकिक गुणों में से तटस्थता और पक्षपात दोनों ही मौजूद हैं, और उनकी अकल्पनीय ऊर्जा द्वारा उन्हें उचित रूप से समायोजित किया जाता है। भगवान परब्रह्म हैं, या निष्पक्ष ब्रह्म का स्रोत हैं, जो उनकी निष्पक्षता की सर्वव्यापी विशेषता है। हालाँकि, अपनी व्यक्तिगत विशेषता में, सभी अलौकिक वैभवों के स्वामी के रूप में, भगवान अपने भक्तों का पक्ष लेकर अपनी पक्षपातपूर्णता दिखाते हैं। पक्षपात, तटस्थता और ऐसे सभी गुण परमेश्वर में मौजूद हैं; अन्यथा सृष्टि में उनका अनुभव नहीं किया जा सकता था। चूँकि वह संपूर्ण अस्तित्व हैं, इसलिए सभी चीजों को पूर्ण रूप से परमात्मा में समायोजित किया जाता है। सापेक्ष संसार में ऐसे गुण विकृत रूप में प्रदर्शित होते हैं, इसलिए हम अध्वैतवाद का अनुभव एक विकृत प्रतिबिंब के रूप में करते हैं। क्योंकि तर्क से यह समझाना संभव नहीं है कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में चीजें कैसे घटित होती हैं, इसलिए भगवान को कभी-कभी अनुभव की सीमा से परे बताया जाता है। लेकिन अगर हम केवल भगवान की अकल्पनीयता को स्वीकार करते हैं, तो हम उनमें सभी चीजों को समायोजित कर सकते हैं। भक्तिपूर्ण लोग भगवान की अकल्पनीय ऊर्जा को समझ नहीं पाते हैं, और इसलिए उनके लिए यह कहा जाता है कि वह कल्पनीय अभिव्यक्ति की सीमा से परे हैं। ब्रह्म-सूत्रों के लेखक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं और कहते हैं, श्रुतेस्तु शब्द-मूलत्वात्: परमेश्वर व्यक्तित्व, एक सामान्य व्यक्ति के लिए अकल्पनीय होने के कारण, केवल वैदिक निषेधों के साक्ष्य से ही समझे जा सकते हैं। स्कंद पुराण पुष्टि करता है, अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्: "एक सामान्य व्यक्ति के लिए अकल्पनीय मामलों को तर्क का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।" हम गहनों और औषधियों जैसी भौतिक चीजों में भी बहुत अद्भुत गुण पाते हैं। वास्तव में, उनके गुण अक्सर अकल्पनीय प्रतीत होते हैं। इसलिए यदि हम परमेश्वर व्यक्तित्व को अकल्पनीय शक्तियाँ नहीं देते हैं, तो हम उनकी सर्वोच्चता स्थापित नहीं कर सकते। इन्हीं अकल्पनीय शक्तियों के कारण भगवान की महिमा को हमेशा समझना मुश्किल माना गया है।

अज्ञानता और शब्दों का तोड़-मरोड़ मानवीय समाज में बहुत आम हैं, लेकिन वे परमेश्वर व्यक्तित्व की अकल्पनीय ऊर्जाओं को समझने में किसी की मदद नहीं करते हैं। यदि हम ऐसी अज्ञानता और शब्द-जाल को स्वीकार करते हैं, तो हम सर्वोच्च प्रभु की छह वैभवों में पूर्णता को स्वीकार नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, परमेश्वर व्यक्तित्व के वैभवों में से एक पूर्ण ज्ञान है। इसलिए, उनमें अज्ञानता की कल्पना कैसे की जा सकती है? वैदिक निर्देश और समझदार तर्क स्थापित करते हैं कि भगवान के द्वारा ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को बनाए रखना और साथ ही उसके रखरखाव की गतिविधियों के प्रति उदासीन रहना परस्पर विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि उनकी अकल्पनीय ऊर्जाएँ हैं। एक व्यक्ति जो हमेशा साँपों के विचार में लीन रहता है, उसके लिए एक रस्सी हमेशा एक साँप प्रतीत होती है, और इसी तरह भौतिक गुणों से परेशान और परमात्मा के ज्ञान से रहित व्यक्ति के लिए, परमेश्वर व्यक्तित्व विभिन्न परेशान करने वाले निष्कर्षों के अनुसार प्रकट होता है।

कोई तर्क दे सकता है कि यदि वह छह पूर्ण वैभवों (भगवान) के साथ पूर्ण रूप से सर्व-ज्ञानी (ब्रह्म) और ईश्वर व्यक्तित्व दोनों है तो परमेश्वर द्वैत से प्रभावित होता है। इस तरह के तर्क का खंडन करते हुए, सूत्र स्वरूप-द्वयम ईक्ष्यते घोषित करता है कि दिखावे के बावजूद, परमेश्वर में द्वैत की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि वह विविध अभिव्यक्तियों में केवल एक हैं। यह समझना कि परमेश्वर अपनी ऊर्जाओं से प्रभावित होकर विविध लीलाएँ दिखाते हैं, उनकी अकल्पनीय विरोधी ऊर्जाओं की स्पष्ट असंगति को तुरंत दूर कर देता है। श्रीमद-भागवतम (3.4.16) भगवान की अकल्पनीय शक्ति का निम्नलिखित विवरण देता है:

कर्मणि अनीहस्य भवोऽभावस्य ते

दुर्गआश्रयोऽथारि-भयात्पलायनम

कालात्मनो यत् प्रमदा-युतआश्रयः

स्वात्मन-रतेः खिद्यति धीर विदां इहा

यद्यपि भगवान को कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है, फिर भी वे काम करते हैं; यद्यपि वे हमेशा अजन्मे हैं, फिर भी वे जन्म लेते हैं; यद्यपि वे समय हैं, जिससे हर कोई डरता है, फिर भी वे अपने दुश्मन के डर से मथुरा से भागकर किले में शरण लेते हैं; और यद्यपि वे आत्मनिर्भर हैं, फिर भी उन्होंने 16,000 महिलाओं से शादी की है। ये लीलाएँ सबसे बुद्धिमान लोगों को भी हैरान कर देने वाले विरोधाभासों की तरह लगती हैं। यदि प्रभु की ये गतिविधियाँ हकीकत नहीं होतीं, तो ऋषि उनके द्वारा परेशान नहीं होते। इसलिए ऐसी गतिविधियों को कभी भी काल्पनिक नहीं माना जाना चाहिए। जब भी प्रभु चाहते हैं, उनकी अकल्पनीय ऊर्जा (योगमाया) ऐसे लीलाओं को रचने और करने में उनकी सेवा करती हैं।

पंचरात्र-शास्त्र नामक शास्त्र मान्य वैदिक शास्त्र हैं जिन्हें महान आचार्यों ने स्वीकार किया है। ये शास्त्र काम और अज्ञान के भावों के उत्पाद नहीं हैं। इसलिए विद्वान विद्वान और ब्राह्मण हमेशा उन्हें सात्वत-संहिताओं के रूप में संदर्भित करते हैं। इन शास्त्रों के मूल वक्ता नारायण हैं, जो भगवान के परम व्यक्तित्व हैं। इसका विशेष रूप से मोक्ष-धर्म (349.68) में उल्लेख किया गया है, जो महाभारत के शांति-पर्व का हिस्सा है। नारद और व्यास जैसे मुक्त ऋषि, जो कि वातानुकूलित आत्माओं के चार दोषों से मुक्त हैं, इन शास्त्रों के प्रचारक हैं। श्री नारद मुनि पंचरात्र-शास्त्र के मूल वक्ता हैं। श्रीमद्-भागवतम को भी सात्वत-संहिता माना जाता है। वास्तव में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने घोषणा की, श्रीमद्-भागवतम पुराणम मालाम: "श्रीमद्-भागवतम एक निर्मल पुराण है।" दुर्भावनापूर्ण संपादक और विद्वान जो अपने नियमों का खंडन करने के लिए पंचरात्र-शास्त्रों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं, वे सबसे घृणित हैं। आधुनिक युग में, ऐसे दुर्भावनापूर्ण विद्वानों ने भगवद-गीता पर भी भ्रामक रूप से टिप्पणी की है, जिसे कृष्ण ने यह साबित करने के लिए बोला था कि कृष्ण कोई नहीं है। मायावादीयों ने पंचरात्रिक-विधि को किस तरह गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, यह नीचे दिखाया जाएगा।

(१) वेदांत-सूत्र २.२.४२ पर टिप्पणी करते हुए, श्रीपाद शंकराचार्य ने दावा किया है कि संकर्षण एक जीव है, जो एक साधारण जीवित इकाई है, लेकिन किसी भी वैदिक शास्त्र में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि प्रभु के भक्तों ने कभी कहा है कि संकर्षण एक साधारण जीवित इकाई है। वह विष्णु श्रेणी में भगवान के परम व्यक्तित्व का एक अचूक पूर्ण विस्तार है, और वह भौतिक प्रकृति की रचना से परे है। वह जीवित संस्थाओं का मूल स्रोत है। उपनिषद घोषणा करते हैं, नित्यो नित्यानाँ चेतनश चेतनानाम्: "वह सभी जीवित संस्थाओं में सर्वोच्च जीवित इकाई है।" इसलिए वह विभु-चैतन्य हैं, सबसे महान। वह सीधे ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति और असीम जीवित प्राणियों का कारण है। वह अनंत जीवित इकाई है, और साधारण जीवित इकाइयाँ असीम हैं। इसलिए उन्हें कभी भी एक साधारण जीवित प्राणी नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि यह अधिकृत शास्त्रों के निष्कर्ष के विरुद्ध होगा। जीवित संस्थाएँ भी जन्म और मृत्यु की सीमाओं से परे हैं। यह वेदों का संस्करण है, और यह उन लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता है जो शास्त्रीय आदेशों का पालन करते हैं और वास्तव में शिष्य-परंपरा में उतरे हैं।

(२) वेदांत-सूत्र २.२.४३ पर शंकराचार्य की टिप्पणी के उत्तर में, यह कहा जाना चाहिए कि सभी विष्णु श्रेणियों के मूल विष्णु, जो कई तरह से वितरित किए जाते हैं, मूल-संकर्षण हैं। मूल का अर्थ है "मूल"। संकर्षण भी विष्णु हैं, लेकिन उन्हीं से अन्य सभी विष्णुओं का विस्तार होता है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता (५.४६) में की गई है, जिसमें कहा गया है कि जैसे एक ज्वाला से दूसरी ज्वाला में स्थानांतरित की गई ज्वाला मूल की तरह कार्य करती है, इसलिए मूल-संकर्षण से निकलने वाले विष्णु मूल विष्णु के समान हैं। उस परम भगवान की पूजा करनी चाहिए, गोविंद, जो इस प्रकार स्वयं का विस्तार करते हैं।

(3) शंकराचार्य द्वारा चौवालीसवें सूत्र पर दी गई टीका के उत्तर में कहा जा सकता है कि पांचरात्र के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करने वाला कोई भी शुद्ध भक्त कभी भी यह कथन स्वीकार नहीं करेगा कि विष्णु के सभी विस्तार अलग-अलग पहचान रखते हैं, क्योंकि यह विचार बिल्कुल झूठा है। यहाँ तक कि खुद श्रीपाद शंकराचार्य ने बयालीसवें सूत्र पर अपनी टीका में स्वीकार किया है कि भगवान स्वयं ही अपने आपको स्वतः ही विविध रूपों में विस्तारित कर सकते हैं। इसलिए बयालीसवें सूत्र पर उनकी टीका और चौवालीसवें सूत्र पर उनकी टीका परस्पर विरोधी है। मायावादी टीकाओं का यही दोष है कि वे भगवत मत का खंडन करने के लिए एक तरकीब के रूप में एक स्थान पर एक कथन और दूसरे स्थान पर एक विरोधी कथन करते हैं। इस प्रकार मायावादी टीकाकार विनियमित सिद्धांतों का भी पालन नहीं करते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भगवत मत नारायण के चतुष्कोणीय रूपों को स्वीकार करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह कई देवताओं को स्वीकार करता है। भक्त अच्छी तरह से जानते हैं कि परम सत्य, भगवान का परम व्यक्तित्व एक है, जिसका कोई दूसरा नहीं है। वे कभी भी सर्वेश्वरवादी, कई देवताओं के उपासक नहीं होते हैं, क्योंकि यह वेदों के निषेध के विरुद्ध है। भक्त पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ मानते हैं कि नारायण अति-पारलौकिक हैं और उनके पास विभिन्न अति-पारलौकिक शक्तियों का अकल्पनीय स्वामित्व है। इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि विद्वान श्रील रूप गोस्वामी के लघु-भागवतामृत का अध्ययन करें, जहाँ इन विचारों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। श्रीपाद शंकरचार्य ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध कारण और प्रभाव के माध्यम से विस्तारित होते हैं। उन्होंने उनकी तुलना पृथ्वी और मिट्टी के बर्तनों से की है। हालाँकि, यह पूरी तरह से अज्ञानी है, क्योंकि उनके विस्तार में कारण और प्रभाव जैसी कोई चीज़ नहीं होती है (नान्यद यत् सद्-असत्-परम)। कूर्म पुराण भी पुष्टि करता है, देह-देही-विभेदोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित: "भगवान के परम व्यक्तित्व में शरीर और आत्मा में कोई अंतर नहीं है।" कारण और प्रभाव भौतिक हैं। उदाहरण के लिए, यह देखा गया है कि पिता का शरीर पुत्र के शरीर का कारण है, लेकिन आत्मा न तो कारण है और न ही प्रभाव। आध्यात्मिक धरातल पर कारण और प्रभाव में पाए जाने वाले भेदों में से कोई भी नहीं है। चूंकि भगवान के परम व्यक्तित्व के सभी रूप आध्यात्मिक रूप से सर्वोच्च हैं, वे समान रूप से प्रकृति के नियंत्रक हैं। चौथे आयाम पर खड़े होकर, वे पारलौकिक मंच पर प्रधान व्यक्ति हैं। उनके विस्तार में भौतिक दूषण का कोई निशान नहीं है क्योंकि भौतिक नियम उन्हें प्रभावित नहीं कर सकते हैं। भौतिक दुनिया के बाहर कारण और प्रभाव जैसा कोई नियम नहीं है। इसलिए कारण और प्रभाव की समझ भगवान के परम व्यक्तित्व के पूर्ण, पारलौकिक, पूर्ण विस्तार तक नहीं पहुँच सकती है। वैदिक साहित्य इस बात को साबित करता है:

ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते

ईश्वर का व्यक्तित्व पूर्ण और परिपूर्ण है, और क्योंकि वो पूरी तरह से परिपूर्ण है, इसलिए उससे होने वाले सभी प्रसार, जैसे यह अद्भुत संसार, पूर्ण रूप से पूर्ण संपूर्णता के रूप में सुसज्जित हैं। पूर्ण संपूर्णता का जो भी उत्पादन किया जाता है वह भी अपने आप में पूर्ण होता है। क्योंकि वह पूर्ण संपूर्ण है, भले ही इतनी सारी पूर्ण इकाइयाँ उससे निकलती हों, फिर भी वह संपूर्ण संतुलन बना रहता है।"(बृहदारण्यक उपनिषद 5.1) यह सबसे स्पष्ट है कि अधर्मी भक्ति सेवा के नियमों और विनियमों का उल्लंघन करते हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति की तुलना, जो विष्णु की बाहरी विशेषता है, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व जो माया के नियंत्रक हैं, या उनके चतुगुने विस्तारों के साथ करने के लिए करते हैं। माया को आत्मा के साथ बराबर करना या माया को प्रभु के साथ बराबर करना नास्तिकता का प्रतीक है। लौकिक सृष्टि, जो ब्रह्मा से लेकर चींटी तक के रूपों में जीवन को प्रकट करता है, सर्वोच्च प्रभु की बाहरी विशेषता है। इसमें भगवद्गीता (एकांशेन स्थिथो जगत) में पुष्टि की गई है कि भगवान की ऊर्जा का एक चौथाई भाग शामिल है। भ्रामक ऊर्जा की लौकिक अभिव्यक्ति भौतिक प्रकृति है, और भौतिक प्रकृति के भीतर सब कुछ पदार्थ से बना है। इसलिए, किसी को भौतिक प्रकृति के विस्तार की तुलना चतुर्-व्यूह से नहीं करनी चाहिए, जो कि ईश्वर के व्यक्तित्व का चौगुना विस्तार है, लेकिन दुर्भाग्यवश मायावादी स्कूल अनुचित रूप से ऐसा करने का प्रयास करता है।

(4) शांकरचार्य की वेदांत-सूत्र 2.2.45 पर टिप्पणी का उत्तर देने के लिए, लाघु-भागवतामृत (पूर्व 5.208-214) में उनके आध्यात्मिक गुणों और उनके आध्यात्मिक स्वभाव का सार निम्नानुसार वर्णित किया गया है: "कुछ कहते हैं कि उत्कृष्टता सभी गुणों से रहित होनी चाहिए क्योंकि गुण केवल पदार्थ में प्रकट होते हैं। उनके अनुसार, सभी गुण अस्थायी, टिमटिमाते मृगतृष्णा की तरह होते हैं। लेकिन यह स्वीकार्य नहीं है। चूंकि ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व पूर्ण है तो उनके गुणों का उससे कोई लेना-देना नहीं है। उनका रूप, नाम, गुण और उनसे संबंधित हर चीज उतनी ही आध्यात्मिक है जितनी वह स्वयं है। परमेश्वर के व्यक्तित्व का हर गुणात्मक विस्तार उनके साथ एकरूप है। चूंकि परम सत्य, भगवान का व्यक्तित्व, सभी सुखों का भंडार है, इसलिए उससे फैलने वाले सभी आध्यात्मिक गुण भी सुख के भंडार हैं। यह ब्रह्म-तर्क के रूप में जाने जाने वाले शास्त्र में पुष्टि की गई है जिसमें कहा गया है सर्वोच्च भगवान हरि अपने आप में योग्य हैं, इसलिए विष्णु और उनके पवित्र भक्तों और उनके आध्यात्मिक गुणों को अपने व्यक्तियों से अलग नहीं किया जा सकता है। विष्णु पुराण में भगवान विष्णु की निम्नलिखित शब्दों में पूजा की जाती है: 'परमेश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व हमारे प्रति दयालु हो। उनका अस्तित्व भौतिक गुणों से कभी भी प्रभावित नहीं होता है।' उसी विष्णु पुराण में यह भी कहा गया है कि सर्वोच्च प्रभु के लिए जिम्मेदार सभी गुण, जैसे ज्ञान, संपन्नता, सुंदरता, शक्ति और प्रभाव, उनसे भिन्न नहीं हैं। यह पद्म पुराण में भी पुष्टि की गई है, जो बताता है कि जब भी सर्वोच्च प्रभु को बिना किसी गुण के वर्णित किया जाता है, तो यह समझा जाना चाहिए कि वह भौतिक गुणों से रहित हैं। श्रीमद्-भागवतम् के प्रथम कांटो (1.16.29) में कहा गया है, "हे धर्म, धार्मिक सिद्धांतों के संरक्षक, सभी महान और उदात्त गुण कृष्ण के व्यक्तित्व में शाश्वत रूप से प्रकट होते हैं, और भक्त और अनुयायी जो विश्वासी बनना चाहते हैं। भी ऐसे दिव्य गुणों को धारण करने की इच्छा रखते हैं।' इसलिए यह समझा जाना चाहिए कि भगवान श्री कृष्ण, परम आनंद का दिव्य रूप, सभी आनंदमय दिव्य गुणों और अकल्पनीय शक्तियों का आधार हैं। इस संबंध में हम श्रीमद्-भागवतम्, तीसरे कांटो, अध्याय छब्बीस, छंद 21, 25, 27 और 28 के संदर्भों की अनुशंसा कर सकते हैं।

श्रीपाद रामानुजाचार्य ने अपने वेदांत-सूत्र पर अपने श्रृ-भाष्य, जिसको वेदांत-सूत्र पर अपने श्रृ-भाष्य, जिसको श्री-भाष्य कहा जाता है, में शंकर के तर्कों का भी खंडन किया है : "श्रीपाद शंकरचार्य ने पंचरात्र को नास्तिक कपिल के दर्शन के बराबर करने का प्रयास किया है और इस तरह, वह यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि पंचरात्र वैदिक आदेशों का खंडन करते हैं। पंचरात्र कहता है कि जीवा नामक व्यक्तित्व सभी कारणों के परम कारण वासुदेव से निकला, प्रद्युम्न, मन, संकर्षण से आया, और अनिरुद्ध, अहंकार, प्रद्युम्न से आया। लेकिन आप नहीं कह सकते कि जीव जन्म लेता है या सृजित होता है, क्योंकि ऐसा कथन वेद के आदेश के विरुद्ध है। जैसा कि कठोपनिषद (२.१८) में कहा गया है, एक आत्मा के रूप में जीव न जन्म ले सकता है न ही मर सकता है। सारा वैदिक साहित्य यह बताता है कि जीव अनादि है। इसलिए जब यह कहा जाता है कि संकर्षण जीव है, इसका मतलब है कि वे जीवों के प्रधान देवता हैं। उसी तरह, प्रद्युम्न मन के प्रधान देवता हैं, और अनिरुद्ध अहंकार के प्रधान देवता हैं।

"यह कहा गया है कि प्रद्युम्न, मन, संकर्षण से पैदा हुआ। लेकिन अगर संकर्षण जीव होते, तो यह स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि जीव मन का कारण नहीं हो सकता। वैदिक आदेश यह बताता है कि सब कुछ – जीवन, मन, इंद्रियों सहित – भगवान से आता है। यह संभव नहीं है कि मन जीव द्वारा पैदा हो, क्योंकि वेद यह बताता है कि सब कुछ परम सत्य, भगवान से आता है।

"संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के पास प्रत्येक में निरपेक्ष भगवद् व्यक्तित्व के सभी सशक्त गुण हैं, जैसा कि प्रकट किए गए लेखों के अनुसार, जिसमें निर्विवाद तथ्य शामिल हैं जिसे कोई खंडन नहीं कर सकता। इसलिए चतुष्कोण अभिव्यक्ति के इन सदस्यों को कभी भी साधारण जीवों के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। प्रत्येक एकपूर्ण विस्तार है निरपेक्ष ईश्वर का, और इसलिए प्रत्येक ज्ञान, वैभव, ऊर्जा, प्रभाव, पराक्रम और सामर्थ्य में सर्वोच्च भगवान के समान है। पंचरात्र के प्रमाण की उपेक्षा नहीं की जा सकती। केवल अप्रशिक्षित व्यक्ति जिन्होंने की पंचरात्र का वास्तव में अध्ययन नहीं किया है, वे सोचते हैं कि पंचरात्र जीवित इकाई के जन्म या शुरुआत के संबंध में श्रुतियों का खंडन करता है। इस संबंध में, हमें श्रीमद-भागवतम् के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए, जो कहता है, 'निर्पेक्ष भगवद् व्यक्तित्व, जिसे वासुदेव के रूप में जाना जाता है और जो अपने समर्पित भक्तों के प्रति बहुत स्नेही है, स्वयं को चौगुने रूपों में विस्तारित करता है जो उसके अधीन हैं और एक ही समय में हर तरह से उसके समान है।' पौष्कर-संहिता कहता है, 'शास्त्र जो अनुशंसा करते हैं कि ब्राह्मण भगवान व्यक्तित्व के चौगुने रूपों का पूजा करें, उन्हें आगम [अधिकृत वैदिक साहित्य] कहा जाता है।' सभी वैष्णव साहित्य में यह कहा गया है कि इन चौगुने रूपों की पूजा करना भगवान व्यक्तित्व वासुदेव की पूजा जितना ही अच्छा है, जो अपने विभिन्न विस्तारों में, छह वैभवों में पूर्ण, अपने भक्तों से उनके निर्धारित कर्तव्यों के परिणामों की भेट स्वीकार कर सकते हैं। शगल के लिए विस्तार की पूजा करते हुए, जैसे कि नृसिंह, राम, शेष और कूर्म, व्यक्ति को संकर्षण चौगुने की पूजा में प्रचारित करते हैं। उस स्थिति से एक व्यक्ति को वासुदेव, सर्वोच्च ब्रह्म की पूजा करने के मंच तक उठाया जाता है। पौष्कर-संहिता में कहा गया है, 'यदि कोई पूरी तरह से नियमित सिद्धांतों के अनुसार पूजा करता है, तो वह भगवान व्यक्तित्व, वासुदेव को प्राप्त कर सकता है।' यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, भगवान वासुदेव की तरह ही अच्छे हैं, क्योंकि उन सभी में अद्भुत शक्ति है और वासुदेव जैसे पारलौकिक रूपों को स्वीकार कर सकते हैं। संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध कभी भी जन्म नहीं लेते हैं, लेकिन वे पवित्र भक्तों की आँखों के सामने विभिन्न अवतारों में खुद को प्रकट कर सकते हैं। यह सभी वैदिक साहित्य का निष्कर्ष है। भगवान अपनी अद्भुत शक्ति से अपने भक्तों के सामने स्वयं को प्रकट कर सकते हैं यह पंचरात्र की शिक्षा के विपरीत नहीं है। चूँकि संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, क्रमशः, सभी जीवों के प्रमुख देवता हैं, संपूर्ण मन और संपूर्ण अहंकार, इसलिए संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को 'जीवा', 'मन' और 'अहंकार' के रूप में नामित करना कभी भी विरोधी नहीं है शास्त्रों के कथन इन शब्दों से इन देवताओं की पहचान होती है, जैसे कि शब्द 'आकाश' और 'प्रकाश' कभी-कभी परम ब्रह्म की पहचान करते हैं।

"शास्त्र जीवित इकाई के जन्म या उत्पादन से पूरी तरह इनकार करते हैं। परम-संहिता में वर्णन किया गया है कि भौतिक प्रकृति, जिसका उपयोग दूसरों के उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वास्तव में निष्क्रिय है और हमेशा परिवर्तन के अधीन है। भौतिक प्रकृति का क्षेत्र फलदायी अभिनेताओं की गतिविधियों का क्षेत्र है, और चूंकि भौतिक क्षेत्र बाह्य रूप से भगवान व्यक्तित्व के साथ संबंधित है, इसलिए यह भी शाश्वत है। प्रत्येक संहिता में, जीव (जीवित इकाई) को शाश्वत के रूप में स्वीकार किया गया है, और पंचरात्र में जीव के जन्म से पूरी तरह इनकार किया गया है। जो कुछ भी उत्पादित होता है उसे भी नष्ट कर दिया जाना चाहिए। इसलिए यदि हम जीवित इकाई के जन्म को स्वीकार करते हैं, तो हमें उसके विनाश को भी स्वीकार करना होगा। लेकिन चूंकि वैदिक साहित्य कहते हैं कि जीवित इकाई शाश्वत है, इसलिए किसी को जीवित प्राणी के बारे में निश्चित समय पर उत्पादित नहीं होना चाहिए। परम-संहिता की शुरुआत में निश्चित रूप से कहा गया है कि भौतिक प्रकृति का चेहरा लगातार बदल रहा है। इसलिए 'शुरुआत', 'विनाश' और इस तरह के सभी शब्द केवल भौतिक प्रकृति में लागू होते हैं।"

इन सभी बातों पर विचार करने पर यह समझ जाना चाहिए कि शंकराचार्य का यह कहना कि संकर्षण एक जीव के रूप में जन्म लेते हैं, वैदिक कथनों के बिल्कुल विरुद्ध है। उनके तर्क उपर्युक्त तर्कों द्वारा पूर्ण रूप से खंडित हो गए हैं। इस संदर्भ में श्रीधर स्वामी द्वारा श्रीमद्-भागवतम (३.१.३४) पर लिखी टीका बहुत उपयोगी है।

शंकराचार्य के उन तर्कों के विस्तृत खंडन के लिए जिनमें यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि संकर्षण एक साधारण जीव हैं, श्रीमत् सुदर्शनचार्य द्वारा श्री-भाष्य पर लिखी टीका का उल्लेख किया जा सकता है, जिसे श्रुत-प्रकाशिका के रूप में जाना जाता है।

मूल चतुर्गुण रूप - कृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - एक और चतुर्गुण रूप में विस्तारित हो जाते हैं जो आध्यात्मिक आकाश के वैकुंठ ग्रहों में मौजूद है। इसलिए आध्यात्मिक आकाश में चतुर्गुण रूप द्वारका में मूल चतुर्गुण के दूसरे स्वरूप हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध सभी अपरिवर्तनीय, परातीत पूर्ण विस्तार हैं, जिनका भौतिक प्रकृति से कोई संबंध नहीं है। दूसरे चतुर्गुण रूप में संकर्षण रूप न केवल बलराम का प्रतिनिधित्व है बल्कि कारण सागर का मूल कारण भी है, जहाँ कारणोदकशायी विष्णु सोए हुए हैं और असंख्य ब्रह्मांडों के बीजों को बाहर निकालते हैं।

आध्यात्मिक आकाश में एक आध्यात्मिक सृजनात्मक ऊर्जा है जिसे तकनीकी रूप से शुद्ध-सत्व कहा जाता है, जो एक शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा है जो ज्ञान, धन, कौशल, आदि के पूर्ण वैभव के साथ सभी वैकुंठ ग्रहों को बनाए रखती है। शुद्ध-सत्व के ये सभी कार्य महा-संकर्षण की शक्तियों को प्रदर्शित करते हैं, जो उन सभी जीवित प्राणियों का अंतिम भंडार है जो भौतिक दुनिया में कष्ट झेल रहे हैं। जब ब्रह्मांडीय सृष्टि का विनाश हो जाता है, तो जीवित प्राणी, जो स्वभाव से अविनाशी होते हैं, महासंकर्षण के शरीर में विश्राम करते हैं। इसलिए संकर्षण को कभी-कभी कुल जीव कहा जाता है। आध्यात्मिक चिंगारियों के रूप में, जीवित प्राणियों में भौतिक ऊर्जा के जुड़ाव में निष्क्रिय रहने की प्रवृत्ति होती है, जैसे आग की चिंगारियों में जैसे ही वे आग छोड़ते हैं, बुझ जाने की प्रवृत्ति होती है। हालाँकि, जीवित प्राणी की आध्यात्मिक प्रकृति को सर्वोच्च प्राणी के साथ मिलने पर फिर से जगाया जा सकता है। क्योंकि जीव पदार्थ या आत्मा में प्रकट हो सकता है, जीव को सीमांत शक्ति कहा जाता है।

संकर्षण कारण विष्णु की उत्पत्ति हैं, जो ब्रह्मांडों को बनाने वाले मूल रूप हैं, और वह संकर्षण श्री नित्यानंद रामा का एक पूर्ण विस्तार मात्र हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)