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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.5.40 
सेइ पर - व्योमे नारायणेर चारि पाशे ।
द्वारका - चतुर्व्यहेर द्वितीय प्रकाशे ॥40॥
 
 
अनुवाद
उस आध्यात्मिक आकाश में, नारायण के चारों ओर, द्वारका के चतुर्भुज विस्तारों में से दूसरा विस्तार है।
 
In that Paravyoṃ, there are the second extensions of the Chaturvyoha of Dvārakā around Nārāyaṇa.
तात्पर्य
आध्यात्मिक आकाश के भीतर द्वारका के चतुष्कोणीय रूपों का एक दूसरा प्रकटीकरण कृष्ण के निवास से है। इन रूपों में, जो सभी आध्यात्मिक और भौतिक विधाओं से परे हैं, श्री बलदेव को महा-संकर्षण के रूप में दर्शाया गया है।

आध्यात्मिक आकाश में गतिविधियों को विशुद्ध आध्यात्मिक अस्तित्व में आंतरिक क्षमता द्वारा प्रकट किया जाता है। वे छह पारलौकिक वैभव में विस्तार करते हैं, जो सभी महा-संकर्षण की अभिव्यक्तियाँ हैं, जो सभी जीवित संस्थाओं का अंतिम भंडार और उद्देश्य है। यद्यपि सीमांत शक्ति से संबंधित है, जिसे जीव-शक्ति के रूप में जाना जाता है, जीवित संस्थाओं के रूप में जानी जाने वाली आध्यात्मिक चिंगारी भौतिक ऊर्जा की स्थितियों के अधीन हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये चिंगारी भगवान की आंतरिक और बाहरी क्षमताओं दोनों से संबंधित हैं जिन्हें सीमांत क्षमता से संबंधित के रूप में जाना जाता है।

वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में ज्ञात परमेश्वर के चतुष्कोणीय रूपों पर विचार करने में, श्रीपाद शंकराचार्य के नेतृत्व में, अवैयक्तिकवादियों ने वेदांत-सूत्र के सूत्रों की व्याख्या की है जो कि अवैयक्तिकता स्कूल के लिए उपयुक्त है। हालांकि, इस तरह के सूत्रों का आंतरिक महत्व प्रदान करने के लिए, वृंदावन के छह गोस्वामियों के नेता श्रील रूप गोस्वामी ने अपने लघु-भागवतामृत में अवैयक्तिकतावादियों को उचित जवाब दिया है, जो कि वेदांत-सूत्र के सूत्रों पर एक प्राकृतिक टिप्पणी है।

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा अपने लघु-भागवतामृत में उद्धृत पदम पुराण का वर्णन है कि आध्यात्मिक आकाश में चार दिशाएँ हैं, जो पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के अनुरूप हैं, जिसमें वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न स्थित हैं। ये रूप भौतिक आकाश में भी स्थित हैं। पदम पुराण आध्यात्मिक आकाश में वेदावती-पुरा नामक एक स्थान का भी वर्णन करता है, जहां वासुदेव निवास करते हैं। विष्णुलोक में, जो कि सत्यलोक से ऊपर है, संकर्षण निवास करते हैं। महा-संकर्षण संकर्षण का दूसरा नाम है। प्रद्युम्न द्वारका-पुरा में रहते हैं, और अनिरुद्ध दूध के समुद्र में, जिसे आमतौर पर अनंत-शय्या के रूप में जाना जाता है, शेष के शाश्वत बिस्तर पर स्थित हैं, जिसे श्वेतद्वीप कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)