Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.5.35 
कामाद्वेषाद्भयात्स्नेहा यथा भक्त्येश्वरे मनः ।
आवेश्य तदधं हित्वा बहवस्तगतिं गताः ॥35॥
 
 
अनुवाद
"जिस प्रकार भगवान की भक्ति के माध्यम से उनके धाम को प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार अनेक लोगों ने काम, ईर्ष्या, भय या स्नेह के माध्यम से अपने पापपूर्ण कार्यों को त्यागकर और अपने मन को भगवान में लीन करके उस लक्ष्य को प्राप्त किया है।"
 
Just as one can attain the abode of God through devotion to the Lord, many have attained the same state by giving up their sinful activities and by fixing their minds on the Lord through lust, anger, fear or affection.”
तात्पर्य
जैसे शक्तिशाली सूर्य अपनी चमकती किरणों से सभी प्रकार की अशुद्धियों को दूर कर सकता है, उसी तरह ईश्वर का सर्व-आध्यात्मिक व्यक्तित्व किसी व्यक्ति में मौजूद सभी भौतिक गुणों को शुद्ध कर सकता है जिसे वह आकर्षित करता है। भले ही कोई व्यक्ति भौतिक वासना के तरीके से ईश्वर की ओर आकर्षित हो, फिर भी ईश्वर की कृपा से ऐसा आकर्षण ईश्वर के प्रति आध्यात्मिक प्रेम में बदल जाता है। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति भय और शत्रुता के कारण भगवान से संबंधित है, तो वह भी भगवान के आध्यात्मिक आकर्षण से शुद्ध हो जाता है। यद्यपि ईश्वर महान हैं और सजीव प्राणी छोटे हैं, वे आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, और इसलिए जैसे ही सजीव प्राणी की स्वतंत्र इच्छा से एक पारस्परिक आदान-प्रदान होता है, वैसे ही महान आध्यात्मिक व्यक्ति छोटे सजीव प्राणी को आकर्षित करता है, इस प्रकार उसे सभी भौतिक बंधनों से मुक्त करता है। यह श्रीमद्-भागवतम (7.1.30) का एक श्लोक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)