श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.5.34 
सूर्य - मण्डल येन बाहिरे निर्विशेष ।
भितरे सूर रथ - आदि सविशेष ॥34॥
 
 
अनुवाद
यह सूर्य के चारों ओर व्याप्त समरूप तेज के समान है। किन्तु सूर्य के भीतर सूर्यदेव के रथ, घोड़े और अन्य ऐश्वर्य विद्यमान हैं।
 
It is like the uniform radiance surrounding the Sun. But within the Sun reside the chariot, horses, and other opulences of the Sun God.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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