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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.5.30 
सालोक्य - सामीप्य - सार्टि - सारूप्य - प्रकार ।
चारि मुक्ति दिया करे जीवेर निस्तार ॥30॥
 
 
अनुवाद
वे पतित जीवों को चार प्रकार की मुक्ति प्रदान करके उनका उद्धार करते हैं - सालोक्य, सामीप्य, साृष्टि और सारूप्य।
 
He saves the fallen souls by providing them four types of salvation – Salokya, Samipya, Sarti and Sarupya.
तात्पर्य
मुक्त आत्माएं दो प्रकार की होती हैं—वे जो प्रभु की कृपा से मुक्त होती हैं और वे जो अपने स्वयं के प्रयास से मुक्त होती हैं। जो अपने स्वयं के प्रयास से मुक्ति प्राप्त करता है, उसे निर्वैयक्तिकवादी कहा जाता है, और वह प्रभु के तेजस्वी प्रकाश, ब्रह्मज्योति में विलीन हो जाता है। लेकिन प्रभु के भक्त जो भक्ति सेवा द्वारा मुक्ति के योग्य बनते हैं, उन्हें चार प्रकार की मुक्ति प्रदान की जाती है, अर्थात् सालोक्य (प्रभु के समान स्थिति), सामीप्य (प्रभु के साथ लगातार संबद्धता), सारष्टि (प्रभु के समान वैभव) और सारूप्य (प्रभु के समान रूप-रेखा)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)