याँर माधुरीते करे लक्ष्मी आकर्षण ।
रूप - गोसाञि करियाछेन से - रूप वर्णन ॥223॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
भाग्य की देवी उनकी मधुरता से आकर्षित होती हैं, जिसका वर्णन श्रील रूप गोस्वामी ने इस प्रकार किया है:
Lakshmiji is attracted by his sweetness, which has been described by Srila Rupa Goswami as follows.
तात्पर्य
श्रील रूप गोस्वामी ने अपने लघु-भागवतामृत में पद्म पुराण से उद्धृत किया है, जहाँ यह कहा गया है कि भाग्य की देवी लक्ष्मी-देवी ने भगवान कृष्ण के आकर्षक गुणों को देखने के बाद उन्हें आकर्षित किया और भगवान कृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उन्होंने ध्यान करना शुरू किया। जब कृष्ण ने उनसे पूछा कि उन्होंने तपस्या के साथ ध्यान क्यों किया, तो लक्ष्मी-देवी ने उत्तर दिया, "मैं वृंदावन में गोपियों की तरह आपकी सहयोगियों में से एक बनना चाहती हूँ।" यह सुनकर, भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया कि यह बिल्कुल असंभव था। लक्ष्मी-देवी ने तब कहा कि वह भगवान के सीने पर एक सुनहरी रेखा की तरह रहना चाहती है। भगवान ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया और तब से लक्ष्मी हमेशा भगवान कृष्ण के सीने पर सुनहरी रेखा के रूप में स्थित हैं। लक्ष्मी-देवी की तपस्या और ध्यान का उल्लेख श्रीमद-भागवतम (10.16.36) में भी किया गया है जहाँ कृष्ण को प्रार्थना करते हुए नाग-पत्नियां, नाग कालिया की पत्नियों ने कहा कि भाग्य की देवी, लक्ष्मी भी उनकी गोपी के रूप में सेवा करना चाहती थीं और उनके चरणों की धूल चाहती थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥