वैराग्य-युग्-भक्ति-रसम् प्रयत्नैर्
अपाययन मामनाभीप्सुमन्ध्यम
कृपांबुधिर यः पर-दुःख-दुःखी
सनातनस्तं प्रभुमाश्रयामि
"वैराग्यमयी भक्ति-रस के अमृत को पीने की इच्छा मुझमें नहीं थी पर सनातन गोस्वामी ने अपनी अकारण दया से उसे मुझको पिलाया, जबकि मैं इसके योग्य भी नहीं था। अतः वे कृपा के सागर हैं। मुझ जैसे पतितों पर उनकी असीम दया होती है और इसलिए मेरे लिए उनके चरण-कमलों में नम्रता पूर्वक नतमस्तक होना कर्तव्य है।" चैतन्य चरितामृत के अंतिम खंड में कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने भी रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी और श्रील जीव गोस्वामी के नामों का विशेष उल्लेख करते हुए, रघुनाथ दास सहित इन तीनों गुरुओं के चरण-कमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित की है। सनातन गोस्वामी को अपने भक्ति-विज्ञान के गुरु के रूप में रघुनाथ दास ने भी स्वीकार किया है। श्रील रूप गोस्वामी को भक्ति-रस-आचार्य कहा जाता है, अर्थात वे भक्ति-रस के तत्वज्ञ हैं। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्ति-रसामृत-सिंधु भक्ति-विज्ञान का शास्त्र है और इस ग्रंथ को पढ़कर भक्ति का स्वरूप जाना जा सकता है। उनका एक अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ उज्ज्वल नीलमणि है। इस ग्रंथ में उन्होंने भगवान कृष्ण और राधारानी के प्रेमाख्यान और उनके दिव्य चरितों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है।
