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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 203
 
 
श्लोक  1.5.203 
सनातन - कृपाय पाइनु भक्तिर सिद्धान्त ।
श्री - रूप - कृपाय पाइनु भक्ति - रस - प्रान्त ॥203॥
 
 
अनुवाद
सनातन गोस्वामी की कृपा से मैंने भक्ति के अंतिम निष्कर्ष सीख लिए हैं और श्री रूप गोस्वामी की कृपा से मैंने भक्ति के परम अमृत का आस्वादन कर लिया है।
 
By the grace of Sanatana Goswami I have attained the ultimate conclusions of devotion and by the grace of Sri Rupa Goswami I have tasted the supreme nectar of devotion.
तात्पर्य
भक्ति-विज्ञान के प्रवर्तक श्री सनातन गोस्वामी प्रभु ने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें बृहद् भगवतामृत अत्यंत प्रसिद्ध है। भक्त, भक्ति और कृष्ण के विषय में जानना हो तो इस ग्रंथ का पाठ आवश्यक है। इसके अतिरिक्त सनातन गोस्वामी ने श्रीमद्भगवत के दशम स्कंद पर एक विशिष्ट टीका लिखी, जिसे दशम-टिप्पणी कहा जाता है। यह टीका इतनी उत्कृष्ट है कि इसे पढ़ने से कृष्ण की प्रेमलीला का अत्यंत गहन ज्ञान होता है। सनातन गोस्वामी का एक अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ है हरि-भक्ति-विलास जिसमें वैष्णवों के सभी विभागों - वैष्णव गृहस्थों, वैष्णव ब्रह्मचारियों, वैष्णव वानप्रस्थों और वैष्णव सन्यासियों के नियमों का वर्णन किया गया है। विशेष रूप से इस ग्रंथ की रचना वैष्णव गृहस्थों के लिए की गई है। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपने प्रार्थना-ग्रंथ विलाप-कुसुमांजलि के छठवें श्लोक में सनातन गोस्वामी का वर्णन करते हुए सनातन गोस्वामी के प्रति अपनी कृतज्ञता इस प्रकार व्यक्त की है:

वैराग्य-युग्-भक्ति-रसम् प्रयत्नैर्

अपाययन मामनाभीप्सुमन्ध्यम

कृपांबुधिर यः पर-दुःख-दुःखी

सनातनस्तं प्रभुमाश्रयामि

"वैराग्यमयी भक्ति-रस के अमृत को पीने की इच्छा मुझमें नहीं थी पर सनातन गोस्वामी ने अपनी अकारण दया से उसे मुझको पिलाया, जबकि मैं इसके योग्य भी नहीं था। अतः वे कृपा के सागर हैं। मुझ जैसे पतितों पर उनकी असीम दया होती है और इसलिए मेरे लिए उनके चरण-कमलों में नम्रता पूर्वक नतमस्तक होना कर्तव्य है।" चैतन्य चरितामृत के अंतिम खंड में कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने भी रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी और श्रील जीव गोस्वामी के नामों का विशेष उल्लेख करते हुए, रघुनाथ दास सहित इन तीनों गुरुओं के चरण-कमलों में अपनी श्रद्धा अर्पित की है। सनातन गोस्वामी को अपने भक्ति-विज्ञान के गुरु के रूप में रघुनाथ दास ने भी स्वीकार किया है। श्रील रूप गोस्वामी को भक्ति-रस-आचार्य कहा जाता है, अर्थात वे भक्ति-रस के तत्वज्ञ हैं। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्ति-रसामृत-सिंधु भक्ति-विज्ञान का शास्त्र है और इस ग्रंथ को पढ़कर भक्ति का स्वरूप जाना जा सकता है। उनका एक अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ उज्ज्वल नीलमणि है। इस ग्रंथ में उन्होंने भगवान कृष्ण और राधारानी के प्रेमाख्यान और उनके दिव्य चरितों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)