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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.5.20 
चिन्तामणि - भूमि, कल्प - वृक्ष - मय वन ।
चर्म - चक्षे देखे तारे प्रपञ्चे र सम ॥20॥
 
 
अनुवाद
वहाँ की भूमि चिंतामणि है, और वन कल्पवृक्षों से भरे हैं। भौतिक दृष्टि से वह एक साधारण स्थान है।
 
The land there is made of Chintamani, and the forests are full of Kalpavriksha trees. The physical eye sees it as an ordinary place.
तात्पर्य
भगवान की कृपा से उनके धाम और वह स्वयं सभी एक साथ मौजूद हो सकते हैं, बिना अपने मूल महत्व को खोए। जब कोई ईश्वर के प्रति प्रेम और स्नेह में पूरी तरह से विकसित हो जाता है, तभी वह उन धामों को उनके मूल स्वरूप में देख सकता है।

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर, भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के उपदेशात्मक वंश में एक महान आचार्य ने हमारे लाभ के लिए कहा है कि व्यक्ति तभी धामों को पूरी तरह से देख सकता है जब वह भौतिक प्रकृति पर अधिपति बनने की मानसिकता को पूरी तरह से छोड़ देता है। किसी की आध्यात्मिक दृष्टि, इस अनुपयुक्त मानसिकता को त्यागने के अनुपात में विकसित होती है कि अनावश्यक रूप से पदार्थ का आनंद लिया जाए। एक रोगी व्यक्ति जो एक निश्चित बुरी आदत के कारण रोगी हो गया है, उसे चिकित्सक की सलाह का पालन करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और एक प्राकृतिक क्रम के रूप में उसे रोग के कारण को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। रोगी बुरी आदत में शामिल नहीं हो सकता है और उसी समय चिकित्सक द्वारा ठीक होने की अपेक्षा करता है। हालांकि, आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता एक रोगग्रस्त वातावरण बनाए हुए है। जीव एक आध्यात्मिक चिंगारी है, जो स्वयं भगवान की तरह ही आध्यात्मिक है। अंतर केवल इतना है कि प्रभु महान हैं और जीव छोटा है। गुणात्मक रूप से वे एक हैं, लेकिन मात्रात्मक रूप से वे भिन्न हैं। इसलिए, चूंकि जीव का निर्माण आध्यात्मिक है, वह केवल आध्यात्मिक आकाश में ही सुखी हो सकता है, जहाँ वैकुण्ठ कहलाने वाले असीमित आध्यात्मिक क्षेत्र हैं। एक आध्यात्मिक प्राणी जो भौतिक शरीर से अपने जीवन को प्रभावित करता है, उसे रोग के कारण को विकसित करने के बजाय अपनी बीमारी से छुटकारा पाने का प्रयास करना चाहिए।

अपनी भौतिक संपत्ति में लीन मूर्ख व्यक्ति अनावश्यक रूप से लोगों के नेता होने पर गर्व करते हैं, लेकिन वे मनुष्य के आध्यात्मिक मूल्य को अनदेखा करते हैं। ऐसे भ्रमित नेता कितने भी वर्षों की योजना बनाते हैं, लेकिन वे मानवता को भौतिक प्रकृति द्वारा भोगी हुई त्रिगुणात्मक पीड़ाओं से होने वाली पीड़ा में शायद ही खुश कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति संघर्ष की किसी भी मात्रा से प्रकृति के नियमों को नियंत्रित नहीं कर सकता है। व्यक्ति को अंत में मृत्यु के अधीन होना चाहिए, प्रकृति का अंतिम कानून। मृत्यु, जन्म, बुढ़ापा और बीमारी जीव की रोगग्रस्त स्थिति के लक्षण हैं। इसलिए मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य इन कष्टों से मुक्त होना और घर वापस जाना, भगवान के पास वापस जाना होना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)