श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  1.5.177 
किंवा, दोंहा ना मानिन्ना हओ त’ पाषण्ड ।
एके मा नि’ आरे ना मानि , - एइ - मत भण्ड ॥177॥
 
 
अनुवाद
"दोनों भाइयों को तुच्छ समझकर नास्तिक बनना, एक पर विश्वास करके तथा दूसरे को तुच्छ समझकर पाखंडी बनने से बेहतर है।"
 
“It would be better to disbelieve both brothers and become an atheist than to respect one brother and disrespect the other and thus become arrogant.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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