श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  1.5.157 
नित्यानन्द - महिमा - सिन्धु अनन्त, अपार ।
एक कणा स्पर्श मात्र , - से कृपा ताँहार ॥157॥
 
 
अनुवाद
भगवान नित्यानन्द की महिमा का सागर अनंत और अथाह है। उनकी कृपा से ही मैं उसकी एक बूँद भी छू सकता हूँ।
 
The ocean of Lord Nityananda's glories is infinite and unfathomable. Only by His grace can I touch even a drop of it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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