Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 140
 
 
श्लोक  1.5.140 
केयं वा कुत आयाता दैवी वा नातासुरी ।
प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥140॥
 
 
अनुवाद
"यह दिव्य शक्ति कौन है और कहाँ से आई है? क्या यह देवता है या राक्षसी? यह अवश्य ही मेरे स्वामी भगवान कृष्ण की मायावी शक्ति है, क्योंकि मुझे और कौन मोहित कर सकता है?"
 
"Who is this yogic power and where did it come from? Is it divine or demonic? It must be the illusory power of my Lord Krishna, for who else can delude me?"
तात्पर्य
भगवान के चंचल लीलाओं ने भगवान ब्रह्मा के मन में संदेह जगा दिया। इसलिए भगवान ब्रह्मा ने कृष्ण की प्रभुता की परीक्षा लेने के लिए अपने आध्यात्मिक शक्तियों द्वारा भगवान के सभी बछड़ों और चरवाहों के लड़कों को चुरा लिया। हालाँकि, श्री कृष्ण ने मैदान में सभी बछड़ों और लड़कों को बदलकर जवाब दिया। इस श्लोक (भाग. 10.13.37) में ऐसे अद्भुत प्रतिशोध पर भगवान बलराम के विस्मय के विचारों को दर्ज किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)