मायातीते व्यापि - वैकुण्ठ - लोके पूर्णेश्वर्यै श्री - चतुर्व्यह - मध्ये ।
रूपं ग्रस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यं तं श्री - नित्यानन्द - रामं प्रपद्ये ॥13॥
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अनुवाद
मैं श्री नित्यानंद राम के चरण कमलों में समर्पण करता हूं, जिन्हें चतुर्व्यूह (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध से युक्त) के बीच संकर्षण के नाम से जाना जाता है। उनके पास पूर्ण ऐश्वर्य है और वे भौतिक सृष्टि से बहुत दूर वैकुंठलोक में रहते हैं।
I take refuge in the lotus feet of Sri Nityananda Rama, who is known as Sankarshana among the four great beings (the four great beings include Vasudeva, Sankarshana, Pradyumna, and Aniruddha). He is endowed with all opulences and resides in the Vaikuntha realm, far away from this material world.
तात्पर्य
यह श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी जी की डायरी की एक कविता है। यह श्री चैतन्य चरितामृत के प्रथम चौदह पदों के आठवें पद के रूप में प्रकट होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥