श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  1.5.127 
अथवा भक्तेर वाक्य मानि सत्य क रि’ ।
सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी ॥127॥
 
 
अनुवाद
लेकिन मैं इसे सत्य मानता हूँ क्योंकि यह भक्तों ने कहा है। चूँकि वे सभी अवतारों के मूल हैं, इसलिए उनमें सब कुछ संभव है।
 
But I accept it as true, because it is the word of devotees. He (Nityananda Prabhu) is the origin of all incarnations, so everything is possible for Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)