श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  1.5.126 
ए - सब प्रमाणे जानि नित्यानन्द - तत्त्व - सीमा ।
ताँहाके ‘अनन्त’ कहि, कि ताँर महिमा ॥126॥
 
 
अनुवाद
इन निष्कर्षों से हम भगवान नित्यानन्द के सत्य की सीमा जान सकते हैं। परन्तु उन्हें अनन्त कहने में क्या महिमा है?
 
From all these evidences, we can understand the extent of Nityananda Prabhu's essence. But what glory is there in calling Him infinite?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)