यम आहुर अस्य स्थिति जन्म-संयमम्
त्रिभिर विहीनम् यम अनंतम् ऋषयः
न वेद सिद्धार्थम इव क्वचित स्थिम्
भू-मण्डलम् मूर्धा-सहस्र-धामसु
"हे मेरे प्रभु, वेदों के स्तोत्र घोषणा करते हैं कि आप सृजन, पालन और विनाश का प्रभावकारी कारण हैं। लेकिन वास्तव में आप सभी सीमाओं से परे हैं और इसलिए आपको असीमित के रूप में जाना जाता है। आपके हजारों फनों पर अनगिनत वैश्विक क्षेत्र विश्राम करते हैं, सरसों के दानों की तरह इतने तुच्छ कि आपको उनके भार का कोई आभास नहीं है।" भागवत आगे कहता है (5.25.2):
यस्येदम् क्षिति-मण्डलम् भगवतोऽनंत-मूर्तेः सहस्र-शीर्षस एकस्मिन एव शीर्षणि ध्रियमाणम् सिद्धार्थ इव लक्ष्यते।
"भगवान अनंतदेव के हजारों फन हैं। प्रत्येक एक वैश्विक क्षेत्र धारण करता है जो सरसों के दाने की तरह दिखाई देता है।"
