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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  1.5.119 
पञ्चाशत्कोटि - योजन पृथिवी - विस्तार ।
याँर एक - फणे रहे सर्षप - आकार ॥119॥
 
 
अनुवाद
पाँच करोड़ योजन व्यास वाला यह ब्रह्माण्ड सरसों के दाने के समान उनके एक फण पर टिका हुआ है।
 
This universe, whose diameter is fifty crore yojanas, rests on one of his hoods as if it were a mustard seed.
तात्पर्य
भगवान श्वेतद्वीप के स्वामी शेषनाग के रूप में अपना विस्तार करते हैं, जो अपने असंख्य फनों पर सभी ग्रहों को थामे हुए हैं। इन विशाल वैश्विक क्षेत्रों की तुलना, शेषनाग के आध्यात्मिक फनों पर विराजमान सरसों के दानों से की जाती है। वैज्ञानिकों का गुरुत्वाकर्षण का नियम भगवान संकर्षण की ऊर्जा का आंशिक स्पष्टीकरण है। "संकर्षण" नाम का गुरुत्वाकर्षण के विचार से एक व्युत्पत्ति संबंध है। श्रीमद्-भागवतम (5.17.21) में शेषनाग का एक उल्लेख है, जहाँ कहा गया है:

यम आहुर अस्य स्थिति जन्म-संयमम्

 त्रिभिर विहीनम् यम अनंतम् ऋषयः

न वेद सिद्धार्थम इव क्वचित स्थिम्

 भू-मण्डलम् मूर्धा-सहस्र-धामसु

"हे मेरे प्रभु, वेदों के स्तोत्र घोषणा करते हैं कि आप सृजन, पालन और विनाश का प्रभावकारी कारण हैं। लेकिन वास्तव में आप सभी सीमाओं से परे हैं और इसलिए आपको असीमित के रूप में जाना जाता है। आपके हजारों फनों पर अनगिनत वैश्विक क्षेत्र विश्राम करते हैं, सरसों के दानों की तरह इतने तुच्छ कि आपको उनके भार का कोई आभास नहीं है।" भागवत आगे कहता है (5.25.2):

यस्येदम् क्षिति-मण्डलम् भगवतोऽनंत-मूर्तेः सहस्र-शीर्षस एकस्मिन एव शीर्षणि ध्रियमाणम् सिद्धार्थ इव लक्ष्यते।

"भगवान अनंतदेव के हजारों फन हैं। प्रत्येक एक वैश्विक क्षेत्र धारण करता है जो सरसों के दाने की तरह दिखाई देता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)