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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 100-101
 
 
श्लोक  1.5.100-101 
अनन्त - शय्याते ताँहा करिल शयन ।
सहस्र मस्तक ताँर सहस्र वदन ॥100॥
सहस्र - चरण - हस्त, सहस्र - नयन ।
सर्व - अवतार - बीज, जगत्कारण ॥101॥
 
 
अनुवाद
वे वहाँ अनंत को अपनी शय्या बनाकर लेटे रहे। भगवान अनंत एक दिव्य सर्प हैं जिनके हजारों सिर, हजारों मुख, हजारों नेत्र और हजारों हाथ-पैर हैं। वे सभी अवतारों के बीज हैं और भौतिक जगत के कारण हैं।
 
He lay down there, using Ananta as his bed. Lord Ananta is the divine serpent with thousands of heads, thousands of faces, thousands of eyes, and thousands of arms and legs. He is the seed of all incarnations and the cause of the material world.
तात्पर्य
गर्भोदकशाही विष्णु के पसीने से सबसे पहले बनी पानी की जलाशय में, भगवान विष्णु के विस्तार शेष पर लेटे हुए हैं, जिन्हें श्रीमद् भागवतम और चारों वेदों में इस प्रकार वर्णित किया गया है:

सहस्र-शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र-पात

स भूमिं विश्वतो वृत्वा-त्यतिष्ठद् दशांगुलम

अनंत-शयन नामक विष्णु रूप के हजारों हाथ-पैर और हजारों आंखें हैं, और वे भौतिक दुनिया में सभी अवतारों के सक्रिय जनरेटर हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)