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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 1: आदि लीला
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अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण
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श्लोक 262
श्लोक
1.4.262
आमा हैते राधा पाय ये जातीय सुख ।
ताहा आस्वादिते आमि सदाइ उन्मुख ॥262॥
अनुवाद
“मैं सदैव उस आनंद का आस्वादन करने के लिए उत्सुक रहता हूँ जो राधारानी मुझसे प्राप्त करती हैं।
I am always eager to taste the happiness that Radharani receives from me.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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