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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 1: आदि लीला
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अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण
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श्लोक 239
श्लोक
1.4.239
आमा हइते आनन्दित हय त्रिभुवन ।
आमाके आनन्द दिबे - ऐछे कोन्जन ॥239॥
अनुवाद
"सारी दुनिया मुझसे सुख पाती है। क्या कोई है जो मुझे सुख दे सके?"
"The whole world derives its joy from me. Is there anyone who can give me joy?"
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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