ओं पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
"परम भगवान पूर्ण और समग्र हैं, और क्योंकि वे पूर्णतः समग्र हैं, उनसे जो भी उत्सर्जन होते हैं जैसे कि यह भौतिक जगत, पूर्णरुप से संपूर्ण हैं। जो भी पूर्ण समग्र से उत्पन्न है वो अपने आप में भी पूर्ण है। क्योंकि वे संपूर्ण समग्र हैं, भले ही उनसे कई संपूर्ण इकाइयां उत्पन्न होती हैं, वे संपूर्ण संतुलन बने रहते हैं।" (श्री ईशावास्योपनिषद, आह्वान)
परम तत्वों के दायरे में, एक और एक एक होता है, और एक घटा एक एक होता है। इसलिए कोई भी परम भगवान के एक अंश को भौतिक भावना में नहीं समझना चाहिए। आध्यात्मिक जगत में भौतिक ऊर्जा या भौतिक अंशों के आकलन का कोई प्रभाव नहीं है। भगवद-गीता के पंद्रहवें अध्याय में, भगवान कहते हैं कि जीवात्मा उनके अंग और अंश हैं। भौतिक और आध्यात्मिक ब्रह्मांडों में असंख्य जीवात्माएं हैं, पर फिर भी भगवान कृष्ण अपने आप पूर्ण हैं। यह सोचना की भगवान ने अपना व्यक्तित्व इसलिए खो दिया क्योंकि उनके कई अंग और अंशों को पूरे ब्रह्मांड में वितरित कर दिया गया है, एक भ्रम है। यह एक भौतिक आकलन है। ऐसे आकलन केवल भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में ही संभव हैं, माया। आध्यात्मिक जगत में भौतिक ऊर्जा केवल अपनी अनुपस्थिति में ही विख्यात है।
विष्णु-तत्व की श्रेणी में एक विस्तार से दूसरे विस्तार तक शक्ति की कोई कमी नहीं होती है, जिस तरह से एक मोमबत्ती से दूसरी मोमबत्ती जलाई जाती है उसमें रोशनी की कोई कमी नहीं होती है। हजारों मोमबत्तियां एक मूल मोमबत्ती से जलाई जा सकती हैं, और सभी में एक समान मोमबत्ती शक्ति होगी। इस तरह से यह समझना चाहिए कि भले ही सभी विष्णु-तत्व, कृष्ण और भगवान चैतन्य से लेकर राम, नृसिंह, वराह आदि, अलग-अलग युगों में अलग-अलग विशेषताओं के साथ प्रकट होते हैं, सभी समान रूप से परम शक्ति से निवेशित हैं।
भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे देवता भौतिक ऊर्जा के संपर्क में आते हैं, और इसलिए उनकी शक्ति और प्रभाव अलग-अलग श्रेणियों के होते हैं। हालाँकि, विष्णु के सभी अवतार शक्ति में समान हैं, क्योंकि माया का प्रभाव तक उन तक नहीं पहुँच सकता।
