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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  1.2.86 
भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव ।
आर्ष - विज्ञ - वाक्ये नाहि दोष एइ सब ॥86॥
 
 
अनुवाद
“प्रामाणिक ऋषियों के कथनों में भूल, भ्रम, छल और दोषपूर्ण धारणा नहीं होती।
 
The words of authentic sages are free from errors, delusions, tendency to deceive and false perceptions (imperfection of the senses).
तात्पर्य
श्रीमद-भागवतम में अवतारों, पुरुष के पूर्ण विस्तारों को सूचीबद्ध किया गया है, और भगवान कृष्ण उनमें से प्रकट होते हैं। लेकिन भागवतम भगवान कृष्ण की परमेश्वर के रूप में विशिष्ट स्थिति को और अधिक स्पष्ट करता है। चूंकि भगवान कृष्ण परमेश्वर के मूल व्यक्तित्व हैं, इसलिए तर्क और तर्क यह स्थापित करते हैं कि उनकी स्थिति हमेशा सर्वोच्च है।

यदि कृष्ण नारायण का पूर्ण विस्तार होते, तो मूल श्लोक को अलग तरह से बनाया गया होता; वास्तव में, इसका क्रम उल्टा होता। लेकिन मुक्त ऋषियों के शब्दों में कोई भूल, भ्रम, छल या अपूर्ण धारणा नहीं हो सकती है। इसलिए इस कथन में कोई गलती नहीं है कि भगवान कृष्ण परमेश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। श्रीमद-भागवत के संस्कृत कथन सभी पारलौकिक ध्वनियाँ हैं। श्रील व्यासदेव ने इन कथनों को पूर्ण बोध के बाद प्रकट किया, और इसलिए वे पूर्ण हैं, क्योंकि व्यासदेव जैसे मुक्त ऋषि अपनी बयानबाजी व्यवस्था में कभी गलती नहीं करते हैं। जब तक कोई इस तथ्य को स्वीकार नहीं करता है, तब तक प्रकट शास्त्रों से सहायता प्राप्त करने का कोई उपयोग नहीं है।

भ्रम का तात्पर्य झूठे ज्ञान या गलतियों से है, जैसे रस्सी को सांप या सीप के खोल को सोना मानना। प्रमाद का तात्पर्य वास्तविकता से अनासक्ति या गलतफहमी से है, और विप्रलोभ धोखा देने की प्रवृत्ति है। करणापाटव का तात्पर्य भौतिक इंद्रियों की अपूर्णता से है। ऐसी अपूर्णता के कई उदाहरण हैं। आँखें वह नहीं देख सकती जो बहुत दूर या बहुत छोटी हो। मनुष्य अपनी पलक भी नहीं देख सकता, जो उसकी आंख के सबसे करीब होती है, और यदि मनुष्य को पीलिया जैसी बीमारी हो जाती है, तो उसे सब कुछ पीला दिखाई देता है। इसी तरह, कान दूर की आवाज़ नहीं सुन सकता। चूँकि भगवान और उनके पूर्ण भागों तथा आत्म-साक्षात्कारी भक्त सभी आध्यात्मिक रूप से स्थित हैं, इसलिए ऐसी कमियों से उन्हें गुमराह नहीं किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)