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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.2.53 
विराडू हिरण्य - गर्भश्च कारणं चेत्युपाधयः ।
ईशस्य व्रत्रिभिहनं तुरीयं तत्प्रचक्षते ॥53॥
 
 
अनुवाद
"भौतिक जगत में भगवान को विराट, हिरण्यगर्भ और कारण नामों से जाना जाता है। लेकिन इन तीन नामों से परे, भगवान अंततः चौथे आयाम में हैं।"
 
In the material world, the Lord's attributes are Virat, Hiranyagarbha, and Karana. But He ultimately resides beyond these three attributes in the fourth dimension (Turiya)."
तात्पर्य
विराट (सुप्रीम होल की असाधारण अभिव्यक्ति), हिरण्यगर्भ (सब के दिव्य आत्मा), और कारण (कारण, या कारण प्रकृति) पुरुषों के सभी लेकिन पदनाम है, जो भौतिक निर्माण के लिए जिम्मेदार है। अतिमानसिक स्थिति इन पदनामों को पार कर जाती है और इसलिए चौथे आयाम की स्थिति कहलाती है. यह श्रीमद-भागवतम के ग्यारहवें कांटो, पंद्रहवें अध्याय, छंद 16 पर श्रीधर स्वामी की कमेंट्री का एक उद्धरण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)