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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.2.52 
ए सभार दर्शनेते आछे माया - गन्ध ।
तुरीय कृष्णेर नाहि मायार सम्बन्ध ॥52॥
 
 
अनुवाद
“सतही तौर पर हम देखते हैं कि इन पुरुषों का माया के साथ संबंध है, लेकिन इनसे ऊपर, चौथे आयाम में, भगवान कृष्ण हैं, जिनका भौतिक ऊर्जा से कोई संपर्क नहीं है।
 
From above we see that these men are connected with Maya, but above them, in the fourth dimension, there is Lord Krishna, who has no contact with the material energy (Maya).
तात्पर्य
तीन पुरुष - कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु - सभी का माया नामक भौतिक ऊर्जा के साथ यह संबंध है, क्योंकि माया के माध्यम से वे भौतिक ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। केरण, गर्भ और क्षीर महासागरों पर क्रमशः निवास करने वाले ये तीन पुरुष, जो भी हैं, उनकी वह परमात्मा होते हैं: कारणोदकशायी विष्णु सम्पूर्ण यूनिवर्स की परमात्मा है, गर्भोदकशायी विष्णु सभी जीवित प्राणियों की परमात्मा है, और क्षीरोदकशायी विष्णु की सभी जीवित प्राणियों की परमात्मा हैं। चूँकि वे सभी किसी न किसी प्रकार भौतिक ऊर्जा के कार्यो से जुड़े हैं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि माया के प्रति उनका थोड़ा लगाव है। लेकिन स्वयं श्री कृष्ण की भगवदीय स्थिति पर माया का थोड़ा भी रंग नहीं चढ़ा है। उनकी भगवदीय स्थिति को तुरीय या चतुर्थ-आयामी अवस्था कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)