भक्ति - योगे भक्त पाय याँहार दर्शन ।
सूर्य येन सविग्रह देखे देवगण ॥25॥
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अनुवाद
अपनी सेवा के माध्यम से भक्तगण भगवान के उस व्यक्तित्व को देखते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग के निवासी सूर्य के व्यक्तित्व को देखते हैं।
Devotees see God through their service in the same way as the inhabitants of heaven see the Sun God.
तात्पर्य
परमेश्वर का शाश्वत रूप है जो भौतिक आँखों से या मानसिक अटकलों द्वारा नहीं देखा जा सकता है। केवल पारलौकिक भक्ति सेवा के द्वारा ही कोई प्रभु के पारलौकिक रूप को समझ सकता है। ये तुलना सूर्य-देव के वैयक्तिक गुणों को देखने की अर्हताओं से की गई है। सूर्य-देव एक व्यक्ति हैं, जो भले ही हमारी आँखों को दिखाई नहीं देते, लेकिन उच्च ग्रहों से उन्हें देवतागण देखते हैं, जिनकी आँखें उनके चारों ओर चमकती धूप को देखने के लिए उपयुक्त होती हैं। प्रत्येक ग्रह का अपना वातावरण होता है जो भौतिक प्रकृति की व्यवस्था के प्रभाव के अनुसार होता है। इसीलिए किसी विशेष ग्रह पर पहुँचने के लिए एक विशेष प्रकार की शारीरिक संरचना होना आवश्यक है। पृथ्वी के निवासी चन्द्रमा तक पहुँचने में समर्थ हो सकते हैं, लेकिन स्वर्ग के निवासी अग्निमय क्षेत्र सूर्य तक भी पहुँच सकते हैं। जो मनुष्य के लिए पृथ्वी पर असंभव है, वह स्वर्ग में देवताओं के लिए उनके भिन्न शरीरों के कारण आसान है। इसी तरह, परम प्रभु को देखने के लिए भक्ति सेवा की आध्यात्मिक आँखें होनी चाहिए। ईश्वर-व्यक्तित्व उन लोगों के लिए अप्राप्य हैं जो पारलौकिक कंपन के संदर्भ के बिना, प्रायोगिक वैज्ञानिक विचार के संदर्भ में परम सत्य के बारे में अटकल लगाने के अभ्यस्त हैं। परम सत्य तक पहुँचने वाला आरोही दृष्टिकोण अवैयक्तिक ब्राह्मण और स्थानीयकृत परमात्मा की प्राप्ति में समाप्त हो जाता है लेकिन परम पारलौकिक व्यक्तित्व नहीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥