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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.2.22 
सेइत गोविन्द साक्षा च्चैतन्य गोसाञि ।
जीव निस्तारिते ऐछे दयालु आर नाइ ॥22॥
 
 
अनुवाद
वे गोविंद साक्षात् चैतन्य गोसांई के रूप में प्रकट होते हैं। पतित आत्माओं का उद्धार करने में कोई अन्य भगवान इतना दयालु नहीं है।
 
That same Govinda himself appears as Chaitanya Gosain. No other Lord is so merciful in saving fallen souls.
तात्पर्य
गोविंद का ब्रह्म और परमात्मा रूप में वर्णन करने के बाद, अब श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक अपना तर्क यह सिद्ध करने के लिए आगे बढ़ाते हैं कि भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु वही व्यक्तित्व हैं। वही भगवान श्री कृष्ण, श्री कृष्ण के भक्त के वेश में, इस नश्वर जगत में अवतरित हुए ताकि उन भ्रष्ट मनुष्यों को वापस लाया जा सके जिन्होंने श्रीमद्भागवद-गीता के समझाने के बाद भी भगवान के व्यक्तित्व को गलत समझा था। श्रीमद्भागवद-गीता में भगवान श्री कृष्ण ने सीधे निर्देश दिया कि परम एक व्यक्ति है, कि अवैयक्तिक ब्रह्म उनकी तेजोमय ज्योति है, और परमात्मा उनका आंशिक प्रतिनिधित्व है। इसलिए सभी मनुष्यों को सभी सांसारिक "वादों" को छोड़कर, श्री कृष्ण के मार्ग का अनुसरण करने की सलाह दी गई थी। हालाँकि, अपराधियों ने अपने ज्ञान की कमी के कारण इस निर्देश को गलत समझा। इस प्रकार अपनी अकारण, असीमित दया से श्री कृष्ण फिर से श्री चैतन्य गोसाईं के रूप में आए।

श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक सबसे अधिक जोर देकर कहते हैं कि भगवान चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्री कृष्ण हैं। वह श्री कृष्ण के प्रकाश या विलास रूपों का विस्तार नहीं हैं; वह स्वयं-रूप गोविंद हैं। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा प्रस्तुत प्रासंगिक शास्त्रीय प्रमाणों के अलावा, भगवान चैतन्य के स्वयं परम भगवान होने के बारे में अनेक अन्य शास्त्रीय कथन हैं। निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं:

(1) चैतन्य उपनिषद (5) से: गौरो सर्वआत्मा महापुरुषो महात्मा महायोगी त्रिगुणातीतः सत्त्वरूपो भक्तिं लोके काश्यति। "भगवान गौर, जो सर्वव्यापी परमात्मा हैं, भगवान, एक महान संत और शक्तिशाली रहस्यवादी के रूप में प्रकट होते हैं जो प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर हैं और पारलौकिक गतिविधि के प्रतीक हैं। वह दुनिया भर में भक्ति के पंथ का प्रसार करते हैं।"

(2) श्वेताश्वतर उपनिषद (6.7 और 3.12) से:

तम ईश्वराणां परमं महेश्वरं

 तम देवतानां परमं च दैवतं

पतिं पतीनां परमं परस्ताद्

 विदाम देवं भुवनेशं ईड्यम

"हे सर्वोच्च भगवान, आप सर्वोच्च महेश्वर हैं, सभी देवताओं की पूजनीय देवता और सभी देवों के सर्वोच्च भगवान। आप सभी नियंत्रकों के नियंत्रक हैं, भगवान, हर पूजनीय चीज़ के भगवान।"

महान प्रभु वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः

सुनिर्मलां इमां प्राप्तिं ईशानो ज्योतिरव्ययः

"भगवान परम व्यक्तित्व महान हैं, जो पारलौकिक ज्ञान का प्रसार करते हैं। बस उनसे जुड़कर अविनाशी ब्रह्मज्योति से जुड़ना है।"

(3) मुंडक उपनिषद (3.1.3) से:

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं

 कर्ताम ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम

"जो व्यक्ति उस सुनहरे रंग के भगवान, परम भगवान, सर्वोच्च अभिनेता, जो परम ब्रह्म के स्रोत हैं, को देखता है, वह मुक्त हो जाता है।"

(4) श्रीमद्भागवतम (11.5.33-34 और 7.9.38) से:

ध्याम्यं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं

 तीर्थास्पदं शिवविरिंचिनुतं शरण्यं

भृत्यार्तिघं प्रणतपालभवार्बधिपोतं

 वंदे महापुरुष ते चरणारविंदम

"हम उस भगवान के चरण कमलों को अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम करते हैं, जिस पर किसी को भी हमेशा ध्यान करना चाहिए। वह अपने भक्तों के अपमान को नष्ट करता है। वह अपने भक्तों के कष्टों को दूर करता है और उनकी इच्छाओं को पूरा करता है। वह सभी पवित्र स्थानों का निवास और सभी संतों का आश्रय है, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा द्वारा पूजनीय है। वह देवताओं के लिए जन्म और मृत्यु के सागर को पार करने वाली नाव है।"

त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं

 धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादारण्यं

मायामृगं दयितयepsितमन्वधावद्

 वंदे महापुरुष ते चरणारविंदम

"हम उस भगवान के चरण कमलों को अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम करते हैं, जिस पर किसी को भी हमेशा ध्यान करना चाहिए। उसने अपने गृहस्थ जीवन को छोड़ दिया, अपनी अनंत संगिनी को छोड़ दिया, जिसकी पूजा स्वर्ग के निवासी भी करते हैं। वह जंगल में भ्रष्ट आत्माओं को मुक्त करने गया, जिन्हें भौतिक ऊर्जा ने भ्रम में डाल दिया है।"

प्रह्लाद ने कहा:

इत्थं नृतिर्यगृषिदेव झषावतारैर्

 लोकान विभावायसि हंति जगत्प्रतीपान

धर्मं महापुरुष पासी युगानुवृत्तं

 छन्नः कलौ यदभावस्त्रियुगो ऽथ स त्वम

"हे प्रभु, आपने अपने पुरुष, पशु, देवता, ऋषि, जलचर इत्यादि अनेक अवतारों में संसार के समस्त शत्रुओं का संहार किया है और इस तरह आपने संसार को आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित किया है। हे महापुरुष, कलियुग में आप कभी-कभी छिपे हुए अवतार में आते हैं। इसलिए आपको त्रियुगा [केवल तीन युगों में प्रकट होने वाले] के रूप में जाना जाता है। "

(5) कृष्ण-यामल-तंत्र से: "पुण्य-क्षेत्रे नव-द्वीपे भविष्यामि शची-सुत:"। "मैं पवित्र भूमि नवद्वीप में शची-देवी के पुत्र के रूप में प्रकट होऊंगा।"

(6) वायु पुराण से: "कलौ संकीर्तनारंभे भविष्यामि शची-सुत:।" "कलियुग में जब संकीर्तन आंदोलन का शुभारंभ होगा, तब मैं शची-देवी के पुत्र के रूप में अवतरित होऊंगा।"

(7) ब्रह्मा-यामल-तंत्र से:

"अथा वाहं धराधामे भूत्वा मद्भक्त-रूप-धृक्

मायायां च भविष्यामि कलौ संकीर्तनागमे"

"कभी-कभी मैं स्वयं भक्त के वेश में संसार के धरातल पर प्रकट होता हूं। विशेष रूप से, संकीर्तन आंदोलन शुरू करने के लिए मैं कलियुग में शची के पुत्र के रूप में प्रकट होता हूं। "

(8) अनंत-संहिता से:

"य एव भगवान कृष्णो राधिकाप्राण-वल्लभः

सृष्ट्य आदौ स जगन्नाथो गौर आसीन महेश्वरी"

"परम व्यक्तित्व, श्री कृष्ण स्वयं, जो श्री राधारानी के प्राणों के प्रिय हैं और सृजन, रक्षण और विनाश में ब्रह्मांड के स्वामी हैं, वे गौर के रूप में प्रकट होते हैं, हे महेश्वरी।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)