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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  1.17.78 
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्री - निकेतनः ।
ब्रह्म - बन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥78॥
 
 
अनुवाद
“चूँकि मैं एक गरीब, पापी ब्रह्म-बंधु हूँ, ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद ब्राह्मणत्व से वंचित हूँ, और आप, भगवान कृष्ण, भाग्य की देवी के आश्रय हैं, यह अद्भुत है, मेरे प्रिय भगवान कृष्ण, कि आपने मुझे अपनी बाहों में भर लिया है।”
 
“Since I am merely a poor, sinful Brahmabandhu, that is, born in a Brahmin family, I lack Brahmin qualifications, and You, O Lord Krishna, are the shelter of Goddess Lakshmi, it is astonishing to me that You have embraced me with Your arms.”
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम (10.81.16) का एक श्लोक है जिसे श्रीकृष्ण के सामने सुदामा विप्र ने बोला था। यह और पिछला श्रीमद्-भागवतम से उद्धृत छंद स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि यद्यपि कृष्ण इतने महान हैं कि किसी के लिए भी उन्हें संतुष्ट करना संभव नहीं है, पर वह अपनी महानता का प्रदर्शन दृष्टिकोण के कई कोणों से अयोग्य व्यक्ति से भी व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट होकर करते हैं। सुदामा विप्र ब्राह्मणों के परिवार में जन्मे थे और वह एक विद्वान थे और कृष्ण के सहपाठी थे, फिर भी वह खुद को ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं मानते थे। वह खुद को ब्रह्म-बंधु कहते थे, जिसका अर्थ है, "ब्राह्मण परिवार में जन्मा परंतु ब्राह्मण योग्यता नहीं रखता।" यद्यपि ब्राह्मणों के लिए उनके महान सम्मान की वजह से कृष्ण ने सुदामा विप्र को गले लगाया, हालाँकि वह एक नियमित ब्राह्मण नहीं थे, बल्कि एक ब्रह्म-बंधु या ब्राह्मण परिवार का दोस्त था। मुरारी गुप्ता को ब्रह्म-बंधु भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनका जन्म वैद्य परिवार में हुआ था और सामाजिक ढाँचे के अनुसार उन्हें शूद्र माना जाता था। लेकिन कृष्ण ने मुरारी गुप्ता पर विशेष दया बरसाई क्योंकि वह प्रभु के प्रिय भक्त थे, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा था। इस विषय पर श्री भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर की विस्तृत चर्चा का तात्पर्य यह है कि इस भौतिक संसार में कोई भी योग्यता भगवान, कृष्ण को संतुष्ट नहीं कर सकती, फिर भी प्रभु के प्रति भक्ति भावना के विकास से सब कुछ सफल हो जाता है।

कृष्ण चेतना के लिए इंटरनेशनल सोसाइटी के सदस्य खुद को ब्रह्म-बंधु भी नहीं कह सकते। इसलिए कृष्ण को संतुष्ट करने का हमारा एकमात्र साधन भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशों का पालन करना है, जो कहते हैं:

यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश

आमारा आज्ञाय गुरु हां तारे एइ देश

"जिससे भी तुम मिलो, उसे कृष्ण की शिक्षाओं के बारे में बताओ। इस तरह, मेरे आदेश पर, एक गुरु बनो और इस देश के लोगों को मुक्ति दो।" (Cc. मध्य 7.128) श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशों का पालन करने की कोशिश करने पर, हम दुनिया के लोगों से भगवद-गीता के अनुसार बात करते हैं। यह हमें भगवान कृष्ण को संतुष्ट करने के लिए योग्य बनाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)